– भाजपा- जेजेपी गठबंधन के नाम पर कब तक नाटक करती रहेगी
– राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के भीतर भरोसा ही खत्म हो गया
रणघोष खास. एक भारतीय की कलम से
लोकतंत्र के नाम पर चुनाव में नेताओं एवं मीडिया का एक बार फिर नंगा नाच नजर आ रहा है। दोनों के बीच अंदरखाने इतना गजब का गठबंधन होता है कि जनता समझ नहीं पाती की भरोसा करें तो किस पर । एक खुद को आमजन की आवाज बताकर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का दावा करता है दूसरा मंचों पर जनता की सेवा करने का पांखड करता है। मकसद दोनों का एक है। नेता को कुर्सी चाहिए ताकि उससे मिलने वाली ताकत में छिपे अर्थ और बल को अपनी भुजा बनाकर अपने ही लोगों पर राज कर सके। मीडिया खुद को जिंदा और मजबूत बनने के लिए चुनाव को माया पर्व मानती है। इसलिए चुनाव में प्रचार प्रसार के नाम पर वह गधों को भी घोड़ों की रेस में सबसे आगे रखने के लिए किसी भी हद तक खुद को गिराने के लिए तैयार रहती है। जहां तक जनता की बात है। उसके व्यवहार, मिजाज एवं सोचने समझने की शक्ति को चुनाव के समय या तो गिरवी रखने का दुस्साहस किया जाता है या फ्री के नाम पर अलग अलग लालच के टुकड़ों के सामने उसे दुब हिलाने के मजबूर किया जाता है। हालांकि अब जनता पहले से ज्यादा समझदार हुई है लेकिन अभी भी संभलने की बहुत गुंजाइश है। वजह मीडिया और नेता हर बार नए चेहरे एवं योजना के तहत उनके मनो मस्तिक पर कब्जा करने में कामयाब हो जाते हैं।
भाजपा- जेजेपी गठबंधन के नाम पर कब तक नाटक करती रहेगी
हरियाणा में होने जा रहे नगर निकाय चुनाव में भाजपा- जेजेपी गठबंधन की हालत उस दंपत्ति की तरह है जो रहते साथ है लेकिन दिनचर्या तलाकशुदा की तरह गुजर रही है। कोई छोटा- बड़ा पर्व या आयोजन में साथ नजर आएंगे लेकिन रूटीन में एक दूसरे को फूटी कौड़ी नहीं सुहाते। नतीजा इस दंपति की गलतियों का खामियाजा जिस तरह उनके बच्चों को भुगतना पड़ रहा है इसी तरह भाजपा- जेजेपी कार्यकताओं को अपने नेताओं की यूज एंड थ्रो राजनीति की कीमत चुकानी पड़ रही है। इससे पूर्व हुए नगर निकाय चुनाव में यह हश्र हो चुका है।
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के भीतर भरोसा ही खत्म हो गया
10 जून को होने जा रहे राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की जो तस्वीर सामने आ रही है। उससे साफ जाहिर होता है कि जिस पार्टी को अपने विधायकों पर ही भरोसा नहीं वह सत्ता में मजबूती से बैठी भाजपा से कैसे लड़ सकती है। देखा जाए तो कांग्रेस पार्टी ने अपने विधायकों को खरीद फरोख्त से बचाने के लिए उन्हें इधर उधर छिपाने का जो खेल रचा है उससे साबित हो गया कि वह अपने अंदर ही अपनों के बीच विश्वास ही खोती जा रही है। यह कांग्रेस की हैसियत और हाशिए का सार्वजनिक जीता जागता प्रमाण है।