पार्षद- अधिकारियों के व्यवहार में दिक्कत है या फाइलों में छिपे कमीशन से

    क्या कोई बता सकता है किसी पार्षद या अधिकारी ने एक दूसरे के कारनामें उजागर किए हो। यह ड्रामा भी दो-तीन दिन में खत्म हो जाएगा


रणघोष खास. सुभाष चौधरी


किसी भी सरकारी महकमें में फाइलें दो वजह से रूकती है। पहला या तो फाइल के कागजात नियम कायदों को पूरा नहीं कर रहे हैं या फिर फाइल जमा कराने वाला सामने वाले की टपक रही लार को नहीं देख पा रहा है। इसके अलावा तीसरी कोई वजह नहीं है। नगर परिषद रेवाड़ी में पिछले दो दिनों से डीएमसी सुभिता ढाका एवं पार्षदों के बीच व्यवहार को लेकर चल रही तानातानी एक दो दिन बाद एक दूसरे को चाय या जूस पिलाकर खत्म् हो जाएगी। पहले भी नप में इस तरह के विवादों   को खत्म करने की परपंरा चलती आ रही है। डीएमसी सुभिता ढाका का साफ कहना है कि उनके पास आ रही फाइलों में दाल में काला नजर आ रहा है। पारदर्शिता होती तो वह टेबल पर नजर नहीं आती। उधर पार्षदों का कहना है कि डीएमसी की नीयत ठीक नहीं है इसलिए वह हमसे ज्यादा ठेकेदारों को ज्यादा गंभीरता से लेती है। हालांकि सबकुछ हवा में तीर छोड़े जा रहे हैं। पार्षदों के पास इस बात की ताकत है कि वे सरकार में मंत्री एवं पदाधिकारियों से मिलकर डीएमसी का तबादला करा सकते हैं जबकि डीमएसी इस इरादे से कुर्सी पर बैठी है कि वह इसके लिए भी तैयार है। इससे पहले डीएमसी भारत भूषण गोगिया भी पार्षदों को रास नहीं आए थे। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि नप में व्यवहार को लेकर लड़ाई है या कामकाज में नहीं बन पा रही आपसी समझ को लेकर । डीएमसी सुभिता ढाका को जानबूझकर फाइल रोकने से क्या फायदा होगा। इससे उन्हें प्रमोशन या मैडल भी नहीं मिलना। उल्टा चौतरफा नाराजगी झेलनी पड़ती है। ऐसे में भला कौन अधिकारी ऐसी मुर्खता वाली गलतियां करेगा। उधर पार्षदों को सदन की मीटिंग में चिल्लाने या अभद्र व्यवहार होने पर क्या मिलेगा।कुछ दिन पहले नप के कर्मचारी पार्षदों के दुर्व्यहार से गुस्सा होकर धरने पर बैठ गए थे मामला पुलिस में चला गया था। आए दिन यह ड्रामा चलता रहता है।  समझ में यह नहीं आ रहा कि नप में समझदार कितने बचे हैं और किससे उम्मीद की जा सकती है। सही मायनों में नप में विवाद या आपसी झगड़े की वजह फाइलों के नाम पर छिपी कमीशनखोरी है जो स्पष्ट तौर पर नजर नहीं आती लेकिन काम करने वाले कर्मचारी, अधिकारी और पार्षदों की मानसिकता पर सीधा हमला करती रहती है। इसलिए नप में कमीशनखोरी से होने वाले काम में शोर नहीं होता जबकि कमीशन नहीं मिलने या दबाव बनाकर काम करवाने के काम में हल्ला सड़क पर आ जाता है। गौर करिए नप में इस तरह के विवाद कई सालों से एक परपंरा के तौर पर चलते आ रहे हैं। मजाल किसी पार्षद या अधिकारी ने एक दूसरे की पोल खोली हो। हरियाणा विजिलेंस ने नप में जितने भी अधिकारियों को पकड़ा है उसमें आमजन ने हिम्मत दिखाई है। इसलिए नप में चल रहा यह ड्रामा भी जल्द ही नए अंदाज के साथ पूरा हो जाएगा।