फलियों से निकलते मटर देख कर लगा प्रकृति बीजों को कितना सहेज कर रखती है

होई जबै द्वै तनहुँ इक


घटती ज़िंदगी: बढ़ती कहानी ( अध्याय 19)


Babuरणघोष खास. बाबू गौतम 

मैं नीचे दौड़ा। उत्सुक बघेरन सी बावरी भी मेरे पीछे थी। उसे पता नहीं था, उसे किसी बाघ से नहीं बल्कि मृग से ब्याह किया है। जो जंगल में हर ख़तरे से दूर रह कर आज तक जीवित है। मैंने उससे कहा, ” तुम ऊपर जाओ।” मेरे स्वर में आदेश का लहज़ा था। मैंने आज तक बावरी से ऐसे कभी भी नहीं बोला था। वह कई देर तक मुझे देखती रही, और फिर धीरे धीरे ऊपर चल गयी। वह मेरे व्यक्तित्व का पहला छिलका उतरते हुए देख रही थी। कुछ टूटा नहीं था, पर मोच सी आई थी, जिसकी पीड़ा का आभास मुझे था। पर इस वक़्त मैं अपने अतीत से दो दो हाथ करने की हिम्मत जुटा रहा था।

ये दोनों पलंग पर बैठे थे। ऐसे जैसे वे अपने घर में  हैं, और मैं बाहर से आया हूँ। मेरा घर ही मेरा राज्य था। मुझे लगा उनकी चुप्पी मुझे अपदस्थ किए जाने की घोषणा है।

मैं उन दोनों का चेहरा नहीं पढ़ पा रहा था। कारण, मैं ये दो चेहरे देखना ही नहीं चाह रहा था।

इतने में एक ने बहुत ही वैराग भाव से कहा, “तुमने बहुत ही अच्छा किया। शायद ही दुनिया में किसी में ऐसा करने की हिम्मत हो। हम तुम्हारी ज़िंदगी में कोई दखल देने नहीं आये हैं। बल्कि तुम्हें यह बताने आए हैं, हमारी वजह से तुम्हें कभी कोई तकलीफ़ नहीं होगी।”

अब दूसरे की बारी थी।

“हम दोस्त रहे हैं। पर तुम्हारी इस शांत ज़िंदगी में हमारी मौजूदगी से कोई भी हलचल हो, हमारे साथ बिताए दिनों का कोई ज़िक्र भी आए, हम कभी नहीं चाहेंगे।”

वापस पहले ने बात का सिरा पकड़ा।

“हम हज़ारों औरतों के पास गये। मगर हम आज जानते हैं, हमने एक दूषित जीवन जिया है। तुम्हारे महकते जीवन के आसपास भी उस विगत की दुर्गंध आये, हम कभी नही चाहेंगे।”

जब दोनों खड़े हुए तो उनके हाथ विनम्रता से जुड़े हुए थे।

दूसरे ने समापन करते  हुए कहा, “अब कभी हम तुम्हें दिखाई नहीं देंगे। अपना जीवन जियो। भगवान आप दोनों को सब खुशियाँ दे।”

मैं सकते में था। उनके अचानक आ पहुँचने के सदमे से नहीं उभरा था कि उनके अप्रत्याशित व्यवहार ने मुझे मूर्छित सा कर दिया था। वे कब दरवाज़े से निकल कर बाहर गये मुझे पता ही नहीं चला।

मेरी चेतना लौटी तो एक ही वाक्य मेरे मस्तिष्क में गूँज रह था- “हम हज़ारों औरतों के पास गये हैं।”

मुझे इंद्र की सहस्र आँखों का ख्याल आ गया। किस तरह काम-पिपासु इंद्र को गौतम ऋषि ने शाप  देकर उसके शरीर पर सहस्र योनियाँ उगा दी थी, और नपुंसक बना दिया था। मुझे लगा इन दोनों ने हज़ार औरतों के पास जाकर अपने आपको इंद्र सा कुत्सित और पौरुषहीन बना लिया है। इस घृणित विचार को मैंने चूंट कर दूर फेंका।

बावरी को लेकर मेरे मन में फ़िक्र ने सिर उठाया। इस फ़िक्र के कई पंजे थे। यदि पता होता तो ये दोनों इतनी सज्जनता  से पेश आएँगे तो मैं बावरी को जाने के लिए नहीं कहता। उसे बुरा लगा होगा। मुझे डर था बावरी ने इन दोनों को अपनी ढाणी में देखा होगा। अगर पहचान लेगी तो बात मेरे अतीत के अंधेरे कमरे में चली जाएगी। हमने अपने भय के बीज स्वयम् बोए होते हैं। उसने नहीं पहचाना तभी तो इन लंपटों को भले आदमी समझ रही थी। खुश है बेचारी मेरे साथ, और वह खुशी सबको दिखाना चाहती है।

दरवाज़ा बंद करके ऊहापोह में छत पर गया। बावरी की अँगुलियाँ मटर की फलियों पर चल रही थी और दृष्टि शून्य में स्थिर थी। भाव विहीन सी। मुझे वन में ईंधन चुगती गौरा की याद आ गयी। फलियों से निकलते मटर देख कर लगा प्रकृति बीजों को कितना सहेज कर रखती है। काश! हम भी प्रेम  के भावों को मन में ऐसे ही सहेज कर रख पाते।

” बुरा लगा?”  मैंने हौले से पूछा।

“ थानै बुरो लाग्यो तो म्हाने तो लागबो ही। कून था ये दोनी? देख्योड़ा सा लाग्या।”

मैंने लड़खड़ाते शब्दों से बात को इधर उधर किया। वह तुरंत वही बावरी बन गयी जिस पर मैं मुग्ध था। पता नहीं, वह मेरा विश्वास कर रही थी या अपने अटूट विश्वास को हिला कर देखने से कतरा रही थी। पर मेरा हर शब्द मेरा गला छील रहा था। बलिवेदी पर पैर रखने सा लग रहा था।

आज सोचता हूँ तो लगता है, काश मैंने सब कुछ उसी दिन बावरी को बता दिया होता। अगर मैंने बता दिया होता तो शायद हमारा जीवन कुछ और होता। मगर संभव नहीं था। संभव होता तो मैं ज़रूर बताता। मुझे जीवन को जैसा मोहक था, वैसा ही रखना था। इसीलिए तो उन दोनों के बारे में बावरी से सब कुछ छिपाया।

ज़िंदगी घटती है, तो कहानी आगे बढ़ती है

क्रमश जारी..