होई जबै द्वै तनहुँ इक
नाउ इज़ द टाइम टू नो ( अध्याय 30)
पुष्कर पहुँचते ही मुझे लगा मैं धरा पर आ गया हूँ, वह धरा जहाँ मृत्यु एक रुदन भी है, और विराम भी। सन्नाटे को तोड़कर कोहराम मचा सकती है मृत्यु, और शोरगुल को सन्नाटे में बदल सकती है। उसे कोई नहीं जानता है। उसे किसी ने नहीं देखा है। उसके आने से एक क्षण पहले हम यहाँ से जा चुके होते हैं। उसके क़दमों में आहट नहीं होती है। यहाँ पुष्कर में कोई मुझे नहीं जानता है। कोई मुझे नहीं देख पायेगा, किसी को मेरी आहट सुनाई नहीं देगी। ‘ मैं ही तो मृत्यु हूँ।'”
सुनकर मेरी तन्द्रा टूटी। देह में एक कंपकंपी हुई।
” पुष्कर तो तुम भी जा चुके हो। नहीं?”
मैंने उत्तर नहीं दिया।
” मैं भी जा चुका था। उन दोनों के साथ ही गया था एक बार। तीर्थराज पुष्कर में स्नान करके सब पाप धुल जाते हैं, उन दोनों का मानना था। जिस धरती पर पाप धुल सकते हैं, उस धरती पर कभी पाप समाप्त नहीं होगा। पापी को ही समाप्त करना पड़ता है। मैं जानता था वे पुष्कर सरोवर में महास्नान के लिए ज़रूर आयेंगे। मैं जब उनके साथ आया तो हम कन्हैया हवेली में रुके थे। कार्तिक पूर्णिमा को लाखों श्रद्धालु पुष्कर सरोवर में स्नान करते हैं। बहुत मुश्किल है इतने बड़े मेले में किसी को ढूंढ पाना। पर मौत ढूंढ लेती है अपना आखेट, चाहे वह कहीं भी हो। मैं उनकी मौत बन कर वहाँ गया था। जीवन मेरे लिए अर्थहीन श्वासों का सिलसिला था। मैं पुष्कर सरोवर के चारों तरफ घूमता रहा, एक एक चेहरे को देखता हुआ। मुझे ख्याल आया- ‘ आज बावरी मेरे साथ होती!” तुरंत मैंने अपने मन की लगाम पकड़ी। “मैं बावरी के साथ के योग्य नहीं हूँ। तब तक तो बिलकुल नहीं, जब तक वे दोनों अधर्मी जीवित हैं।”
मैंने सरोवर में स्नान नहीं किया। मृत्यु रक्त में स्नान करती है। मेरा हाथ बार बार मेरे थैले में रखी दरांती पर जा रहा था। रात गहरा रही थी। लोगों की भीड़ छँटना शुरू हो गई थी। उन दोनों तक पहुँचने की मेरी आस दीये की लौ की तरह धीमी होती जा रही थी।
अगर यहाँ नहीं मिले तो मैं कहाँ खोजूंगा उन्हें? एक समय आता है, क्रोध में जलता हुआ मनुष्य निस्सहाय महसूस करना आरम्भ कर देता है। और क्रोध का पर्वत पिघल कर अश्रुधारा बन जाता है।
” मैं मनुष्य हूँ, एक असहाय मनुष्य। मुझे प्रकृति ने एक ही शक्ति दी है, वह है धैर्य। मुझे धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए।” मैंने खुद को समझाया, और मैं निढाल होकर बैठ गया।
तारों की झिलमिलाहट और चंद्रमा की चाँदनी मेरी आँखों में चुभ रही थी। इसी चंद्रमा ने मुर्गा बनकर बांग दी थी तभी तो ऋषि गौतम को भरम हुआ था कि सुबह हो गई है और वह गंगास्नान के लिए चले गए थे। अहिल्या के शीलहरण में यही चंद्रमा इंद्र के षड्यंत्र का साथी था।
” दादी कही करी।” मैं बावरी की आवाज़ सुनकर चौंक गया। मैंने अपने चारों तरफ देखा। कोई नहीं था। शायद यह ख्याल मेरे मन में आया था कि बावरी यह बात सुनती तो कहती- ” दादी कही करी।” मैं बावरी की नहीं अपने भीतर बसी बावरी की आवाज़ सुन रहा था। हो सकता है यह बात भी बावरी की दादी ने उसे बताई हो।
मैंने घृणा से चाँद की तरफ देखा। कितने ही अपराधों का मूक साक्षी है यह, और कितने ही पापों का भागीदार।
” हार गया के भंवर जी ? सावतरी माता के मन्दर कोन्या जाओगा के? घणी चढ़ाई सै!” फिर बावरी की आवाज़ मुझे सुनाई दी।
मुझे याद आया, रत्नागिरी पहाड़ी पर सावित्री माता के मंदिर ज़रूर जाते हैं, वे दोनों। पर इतनी रात? मुझे लगा कहीं मैं थकान और हताशा से बौखला तो नहीं गया हूँ। मेरा एक एक पैर एक एक मन का हो गया था, थकान से। रत्नागिरी पहाड़ी पर चढ़ते मैं इतना पस्त हो जाऊँगा कि मुझे कोई हल्का सा धक्का मार दे तो गिर जाऊँगा। नहीं गया तो हो सकता है, हमेशा पछताता रहूँ। यह फैसले की घड़ी थी। कन्हैया हवेली जाऊँ या सावित्री माता के मंदिर। मैंने फैसला किया मैं अपने मन से निकली बावरी की आवाज़ के पीछे चलूँगा। मुझे उस आवाज़ में संकेत दिखाई दिया।
“नहीं, मैं हार नहीं सकता, मैं मर नहीं सकता, मैं तो स्वयं मौत हूँ।” मौत अगर थक जाये, मौत अगर हार जाये, तो भी जीवन होगा, मगर किसी को पता नहीं चलेगा, जीवन है। मैं हिम्मत करके उठा।
मुझे पहली बार लगा, हम अपने पैरों पर नहीं चलते हैं, हम अपने आत्मबल पर चलते हैं।
देखो मुझे, मेरे पैर नहीं हैं, और मैं तुम तक पहुँच गया हूँ।”
उसने मेरी ओर देखा तो मैंने आँखें बंद कर ली।
कुछ था जो खुली आँखों से देखना सम्भव नहीं था। खुली आँखों के सामने इतना कुछ एक साथ होता है कि वे सब कुछ थोड़ा थोड़ा देखती हैं।
मैंने उसे पहचान लिया था, और उसने मुझे।
मुझे उसकी फुसफुसाहट सुनाई दी- ‘जान लेने का समय आ गया है।’
मेरी आँखें खुल गई।
वह मुस्कुरा रहा था:
‘नाउ इज़ द टाइम टू नो।’
क्रमश: जारी..
