पर आज तुम मानते हो, भगवान के होने या नहीं होने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है यह समझना कि विगत को कभी नहीं बदला जा सकता है

होई जबै द्वै तनहुँ इक


यद् पिंडे तद् ब्रह्माण्डे (अध्याय 29)


Babuरणघोष खास. बाबू गौतम 

गाँव के बाहर जमघट लग गया था। सूरज को बादलों ने ऐसे ढ़क लिया था कि दिन है या रात, कहना मुश्किल था। पृथ्वी कोई और ग्रह सी लग रही थी। गीतों की गूंज धीमी होती चली गई, और अंत में नीरवता छा गई। ऐसी नीरवता जो सृजन और विध्वंस से पहले होती है। बावरी ने मेरी बाँह पकड़ कर कहा- ” बस, भंवर जी। आगा का सफर मैं थम एकला सो इब। विपदा आवैगी। या बावरी को हाथ पकड़ कै थम नै ठीक करयो के गलत, थम जाणो। पर मेरो जीवन सफल हो गयो। मैं परलै तक थारी हुयी।” उसकी आँखों की तरलता पलकें बंद करते ही टपक जायेगी, उसे पता था। वह खुली आँख पीछे हटती गई, और दिन पर चढ़ी अँधेरे की चादर में समाती चली गई। दूर होती हुई एक बिंदु में बदल गई, मैं उसे देखता रहा। मैं उसे आज भी देख रहा हूँ।’

उसने नज़र उठाई। मेरी तरफ देखा, और फिर कहानी में उतर गया।

” मैंने निगाह चारों तरफ घुमाई।। वहाँ कोई नहीं था। सब जा चुके थे। स्त्रियां, बच्चे, जन्मे, अजन्मे। मैं नितान्त अकेला था, मेरे सिर पर गणगौर थी। मुझे बाघोत शिव मंदिर जाना था, इस गणगौर का विसर्जन करके, इसका जोड़ा सांसरणी की मढ़ी पर चढ़ाना था। और उसके आगे थी प्रतिशोध की ज्वाला, जिसमें जलने जलाने के लिए मैं बेचैन था। समय कम था।

मैंने कदम बढ़ाये।”

वह एक साँस बोलता गया।

” कैरवाल से आगे निकलते ही हल्की बारिश होने लगी। मुझे लगा बावरी हमेशा के लिए मुझसे दूर चली गई है। मैं जैसे तैसे बाघोत के शिव मंदिर पहुँचा। जोड़ा उतार गणगौर का विसर्जन किया, और जोड़ा सांसरणी की मढ़ी पर रख दिया। भोर होने को आई थी। मैं ट्रांस की अवस्था में था। लग रहा था मैं अकेला हूँ इस ब्रह्माण्ड में, और आगे की यात्रा मुझे अकेले ही करनी है। मुझे किसी दैवी शक्ति पर नहीं, अपनी मौलिक शक्ति पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ना है। अब खोने के लिए मेरे पास कुछ नहीं बचा था। मैं अपने घर लौटा। दो जोड़ी कपडे एक थैले में डाले, और उनके साथ रख ली, वह दरांती जिसकी नोक पर लगा ख़ून सूख चुका था। गायों को खूंटे से खोल दिया। उनकी निरीहता का शूल मुझे चुभा तो मैंने आँखे मूँद ली। दरवाज़ा खुला छोड़ कर मैं निकल गया।”

उसने साँस ली।

” कभी तुमने ऐसी यात्रा की है, जिसमें तुमने कुछ भी नहीं देखा?…मेरा मतलब है तुम एक जगह से दूसरी जगह पहुँच गए, मगर स्वयं और साधन के सिवाय कुछ भी तुम्हारी स्मृति में नहीं है?”

उसका प्रश्न मुझे बेतुका लगा। मैं एकटक उसे देखता रहा।

” मैं जानता हूँ की है, तुमने ऐसी यात्रा। मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ। तुम कोई 14 साल के थे तब। तुम्हें जब बताया गया लीलू की मौत हो गई है, तुमने मानने से इंकार कर दिया। तुमने ईश्वर से कहा था- “नहीं। बताओ मैं क्या करूँ कि सीहोर पहुँचने पर मुझे खबर मिले लीलू जीवित है। तुमने खुद ही भगवान की और से चनौती भी तय कर ली थी। ” मैं सीहोर पहुँचने तक एक क्षण भी तुम्हें नहीं भूलूँगा भगवान, पर तुम्हें लीलू को जीवित करना होगा।” तुमने चुनौती पूरी की। उस यात्रा में तुम पैदल चले, बस में बैठे। बस इतना ही याद है तुम्हें। पर लीलू जीवित नहीं हुआ।”

मैं उसकी बात सुनकर हक्का बक्का रह गया। ‘यह मेरे गांव, मेरे घर तक ही नहीं, मेरे भीतर भी घुसा हुआ है।’

मेरा मन किया, उठकर चला जाऊँ, पर मेरे पैर साथ देने को तैयार नहीं थे।

” तुम्हें भगवान से बहुत निराशा हुई थी। तुमने उसके वजूद को नकारने का मन बना लिया था। पर आज तुम मानते हो, भगवान के होने या नहीं होने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है यह समझना कि विगत को कभी नहीं बदला जा सकता है। मनुष्य, देवता या भगवान, कोई भी विगत को नहीं बदल सकता। जो हो चुका है, वह समय में रहता है, पर फ्रीज होकर। वह तुम्हें दिखाई देता है, उसको तुम दिखाई नहीं देते हो।” मेरी बेचैनी उसने आँक ली थी। वह आगे बढ़ा।

” उस यात्रा में मैं अकेला था। मिले होंगे रास्ते में लोग, रेवाड़ी स्टेशन पर भी रहे होंगे लोग, रेवाड़ी से अजमेर जाती हुई ट्रेन में भी रहे होंगे यात्री, पर मैंने किसी को नहीं देखा। मैं अकेला चल रह था। इस धरती पर ही नहीं, इस ब्रह्माण्ड में ही मैं अकेला था। बस अंधेरा था, और सन्नाटा। इस ब्रह्माण्ड के अंधेरे को चीरती हुई, इस ब्रह्माण्ड के सन्नाटे को चीरती हुई जा रही थी ट्रेन। मेरे मन में भी गहन अँधेरा था, सघन सन्नाटा था।

यद् पिंडे तद् ब्रह्माण्डे।

क्रमश: जारी..

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