मुझे लगता है, मेरा इस धरती और आसमान से एक अनूठा रिश्ता है

होई जबै द्वै तनहुँ इक


हथेलियों पर लिखी इबारत ( अध्याय 17)


Babuरणघोष खास. बाबू गौतम 

“नहीं बताना चाहते? कोई बात नहीं। चुप्पी भी एक ठोस जवाब होती है।”

वह बोलता गया।

“तुम मुझ से डर रहे हो, मैं जानता हूँ। और यह सच भी है कि तुम मेरी  गिरफ़्त में आ चुके हो। मेरे पास कोई जल्दी से नहीं आता है। मुझे याद है, तुम्हारा आत्मविश्वास, जब तुमने अंगुलियों में घुमाकर कार की चाबी जेब में डाली थी। सोचते हुए- ‘चलो  इस धूप को देख कर मुस्कुराते हुए लूले की कहानी पूछते हैं। पाँच दस रुपये उड़ा देते हैं।’ दरअसल मुझे भी आश्चर्य हुआ था, तुम्हारी बेपरवाही पर। लोग अक्सर ऐसा करते नहीं हैं।”

वह रुका।

“कहीं पास ही रहते हो?” मेरी आँखों में आँखें डाल कर उसने पूछा।

मेरी तीखी नज़र को धुएँ की तरह हटा कर, हँसा।

“पैरों में स्लीपर देख कर पता चलता है।” उसने मेरे पैरों की तरफ देखा। “जिनको पैर ज़मीन पर रखने होते हैं। उनको यह सब सोचना होता है, घर से निकलने से पहले। मुझे देखो!” उसने अपने अविद्यमान पैरों को देखा। मुझे लगता है, मेरा इस धरती और आसमान से एक अनूठा रिश्ता है। धरती घूम रही है, मेरे लिए, और आसमान ठहरा हुआ है, मेरे लिए। लगता है ये मेरी निजी संपत्ति है।”

वह इतना धीमा हो गया जैसे मेरे कान में बता रहा है- “यह प्यार है दोस्त!”

स्वर ऊँचा किया।

“खैर छोड़ो। तुम्हें तो कहानी से मतलब है ना! मेरे और बावरी के प्यार को ज़िंदा रखना था मुझे, इसलिए मुझे उसकी साँस बंद  करनी पड़ी। अगर वह अपनी मर्ज़ी से आख़िरी साँस लेती तो सब कुछ ख़त्म हो जाता।”

थोड़ी देर चुप रहा।

“ये दोनों जब से गाँव में आए, मैं दरवाज़ा बंद रखने लगा। मैं बचपन से ही बहुत सहनशील था। बहुत दयालु। लोग डरपोक कहते थे। मेरी माँ कहा करती बच्चा था तो चींटी की कतार जिधर दिखाई दे जाए उधर नहीं जाता था।डरता था कि पैरों के नीचे चीटियाँ मर जाएँगी।”

उसने अपनी हथेलियों को खोल कर गौर से देखा। जैसे उन पर चार खूनों की इबारत लिखी थी।”

“इन दोनों को तो मेरा स्वभाव पता था। मुझे लगता था एक दिन हाथ पर हाथ मारते हुए आएँगे, ” क्या रे, दिखा तो तेरी सांसरणी….” बीच मे ही चुप हो गया।

“धूप जा रही है। अब तुम जाओ। कल।”

क्रमश: जारी..