मेरा ख़ून अचानक मेरी धमनियों में जम गया

होई जबै द्वै तनहुँ इक


अंधेरे के पार  ( अध्याय 7)


Babuरणघोष खास: बाबू गौतम

गाड़ी स्टार्ट की तो एक अजीब सी मायूसी तारी थी। सीतड़ी? यही नाम बताया था ना बूढ़े ने? सीता का अपभ्रंश। जिसे यह बावरी कहता है। आज मैं जान जाऊँगा कैसे मरी थी। कैसे हत्या की थी उसकी इस इंसान ने, जो आज बिना पैरों के घिसट रहा है धरती पर। धरती ! सीता की माँ। सब की माँ। एक दिन सब को समा लेती है अपने अंदर। यह मायूसी बावरी की मृत्यु के सत्य की पूर्वानुभूति से जन्मी थी, या एक प्रबल जिज्ञासा की समाप्ति के आभास से? पता नहीं। आज वह मुझे हत्यारा लगा। सुहावनी धूप में बैठा एक असह्य मुस्कुराहट का धनी। एक क्रूर सा जोकर।

चार सौ रुपये मैंने ऊपर की जेब में रख लिए थे। उसे थमा कर आज इस कहानी का समापन करने के लिए। इस तिलिस्मी जाल से छूट कर भागना था मुझे। उन सब सवालों को भूल कर जो उठ रहे थे मन में, जवाब माँगते।

पैसे आगे करते ही उसने सवाल किया, “कितने हैं?”

” चार सौ!”

“आठ सौ!” वह हंसा। “आठ सौ बिरादार, इस तरह एक कहानी को बीच में छोड़ कर आगे जाने का दुगना। रिटर्न टिकट की कीमत दुगनी होती है ना?”

मेरी बहवें तनी देख कर उसे कौतुक लग रहा था।

” पैसे के नाम पर इतने उखड़ क्यों जाते हो तुम? मुझे देखो, कुछ नहीं है मेरे पास। पर पैसे का ज़रा भी लालच नहीं। मैं जानता हूँ तुम आठ सौ लेकर ही नहीं आए हो। मेरे सामने इतना कमज़ोर महसूस करते हो कि कहीं जेब में ज़्यादा हुए तो ज़्यादा देने पड़ जाएँगे। चलो रास्ता निकालते हैं। ये पैसे तो वापस रख लीजिए, आप की गाड़ी लाइए। मेरी वजह से इतनी दूर खड़ा करके आते हैं।”

मैं उसका आशय नहीं समझा। प्रश्नसूचक नज़र से उसे ताकता रहा।

” कुछ नहीं, बस यहाँ से थोड़ी दूर चलते हैं। मैं आपको इत्मीनान से बताऊँगा बावरी की मौत का किस्सा। आप यहाँ बैठ नहीं पाते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता है। दूसरे, लोग भी देखते हैं हमें। हालाँकि कोई नहीं आएगा, मेरे और आपके बीच में। तीन दिन हो गये, देखा आपने कोई आकर भी खड़ा हुआ हो।”

मेरा दिल किया इस को दो चार खरी खोटी सुनाऊँ और निकल लूँ। घुसता ही जा रहा है हरामी। यह सच था कि वह मेरे मन के भीतर बलात् घुसता जा रहा था।

उसे अपनी जगह दिखाने के लिए मैं कह बैठा, ” लो अभी लाता हूँ गाड़ी। चलो, कहाँ चलना है।” पर यह मेरे साहस की अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि मन में उपजे भय को उँलीचने का दुराग्रह था।

मैं गाड़ी लेकर आया तो वह सरक कर सड़क के किनारे तक आ चुका था। दरवाज़ा खोलते ही उसने हाथों पर ऐसी कलाबाजी खाई की सीधा सीट पर जम गया।

” मेरी गाड़ी उठा कर पिछली सीट पर रख लो।”

हिकारत से उसे घूरते हुए, उसकी पटरीनुमा गाड़ी पिछली सीट पर रख, मैं स्टीरिंग पर आकर बैठ गया।

झिड़कने के स्वर में मैंने पूछा, “बताओ कहाँ चलना है?”

” कहीं नहीं, बस फाइव गार्डेन तक।” उसने बेपरवाह लहजे में कहा।

मेरा ख़ून अचानक मेरी धमनियों में जम गया। मैं कुछ क्षण के लिए पत्थर हो गया था।

– क्या इसे पता है मैं कहाँ रहता हूँ?

मैंने सूखी जीभ पर ज़ोर डाल कर कहा, “फाइव गार्डेन किस लिए?”

“बस ऐसे ही। वहाँ गार्डेन में बेंच पर बैठना, और मैं हरी घास पर बैठ कर सुनाऊँगा, आगे की कहानी।

गाड़ी स्टार्ट करने से पहले मैं आँखों के आगे फैले अंधेरे को देख रहा था। अंधेरे के पार कुछ था।

क्रमश: जारी..