होई जबै द्वै तनहुँ इक
समय वृतीय चलता है ( अध्याय 16)
इंद्र अपनी सहस्र पलकें नीचे किए सुनते रहे। यह उनके क्रोध के अतिरेक और प्रतिशोध की मुद्रा थी।
अपनी विष भरी मुस्कान के साथ बोले,”ईसर देव आपको ही नहीं आपके वंशजों को भी इस धृष्टता का दंड भरना होगा। आपको ब्रह्मा जी का संरक्षण है, जो आपकी संतानों को नहीं होगा। जैसे ब्रह्मा चाहते हैं, तुम्हें संतान होंगी। जितना चाहोगे उतनी होंगी।”
उनके भाव में कुटिलता उभरी, “पुत्रियाँ तो बहुत होंगी। क्योंकि वंशवृद्धि में गति के लिए स्त्रियाँ अधिक चाहियें। श्री ब्रह्माय नम:!”
अचानक उतेजित हो गये, ” तुमने मर्त्यलोक में रह कर स्वर्ग के देवता का अपमान किया है। हमारे सर्वमान्य अधिकार से हमें वंचित किया है। जा, मैं तुझे शाप देता हूँ। तुम्हारे कुल में पैदा होने वाली हर बाला को विवाह से पूर्व, देवता नहीं, घर पर आए अतिथि की शैय्या पर सोना होगा, अन्यथा वह कभी संतान का मुँह नहीं देखेगी।”
ईसर क्रोध से काँप रहे थे, “स्मरण रहे इंद्र, मैं भोले शिव का नहीं, उस त्रिनेत्र शिव का पुत्र भी हूँ जिसके भय से तीनों लोक काँपते है। मुझे कोई लोभ नहीं है, संतान का या अपना वंश चलाने का। मेरे लिए मेरी गौरा ही मेरा संसार है। मैं ठोकर मारता हूँ तुम्हारे देवलोक को। स्त्री तुम्हारे लिए विलास का साधन है इंद्र, पर मेरे लिए प्रेम की प्रतिमा है। मैं तुम्हें अंतिम चेतावनी देता हूँ।”
गौरा अब तक विवाद सुन रही थी। ईसर के पास आई और इंद्र को आँखों मे घृणा भर कर घूरा, जैसे कह रही थी, “सब अहिल्या नहीं होती हैं।”
देवराज इंद्र का सिर आज उस दिन से भी अधिक नीचा था, जब कुटिया से दबे पाँव निकलते हुए उनका ऋषि गौतम से सामना हुआ था।
कितना निकृष्ट शाप था यह, ईसर जानते थे। उन्होंने मुस्कुरा कर गौरा से कहा, “तुम्हारे साथ जीने के लिए मैं सहस्र दुखों का सामना कर सकता हूँ।” ईसर की मुस्कुराहट में पुष्प का अभिनय नहीं था, बल्कि संताप की ठोस धातु पर प्रेम की किरण से उपजी हुई चमक थी।
गौरा का पवित्र प्रेम और मादक गंध हर घड़ी ईसर को निमंत्रण देते। उधर ब्रह्मा का आशीर्वाद था, वंशवृद्धि का। ईसर और गौरा ने इस धरा पर अपना लघु सा जीवन प्रेममय रह कर बिताया। पर वर्ष के उस विशेष माह में, उस विशेष दिन जब वे एक हुए, गौरा गर्भवती हुई। ब्रह्मा प्रसन्न हुए। गौरा ईसर की चिंता बढ़ी। इस तरह उनके यहाँ दो पुत्रियों ने जन्म लिया।
बावरी कहा करती उनका नाम था, सिरी और सन्सिरी। मैं समझता हूँ, श्री और संश्री रहा होगा।
गौरा ने ईसर को आश्वासन दिया, “आप चिंता मत करो ईसर, मैं अपनी पुत्रियों को ऐसी शिक्षा दूँगी कि वे निस्संतान मर जाएँगी, पर अपना सतीत्व नहीं गवाएँगी।”
गौरा और ईसर को जीवन का अर्धकाल आते ही पृथ्वी लोक छोड़ना पड़ा। उन्होने देवलोक को ठुकरा दिया। दोनो कहाँ गये, कैसे गये, यह एक अलग कहानी है। इस लोक से जाते समय उन्होंने दोनों पुत्रियों से वचन लिया।
श्री ने कभी किसी पुरुष की ओर मुँह तक नहीं किया, और अपने यौवन में ही समाधि ले ली। अकेले रह कर मार्ग से नहीं भटकना ही असली परीक्षा है। हमारा कुल ही समाप्त हो जाएगा, यह विचार संश्री के संस्कारों पर भारी पड़ गया। उसने एक दिन अपने आपको एक अतिथि को सौंप दिया। और दूसरे व्यक्ति से विवाह करके घर बसा लिया। यह सांसरिया जाति उस संश्री के वंशज है।
मैंने तन्मयता से कहानी सुनी। कुछ देर हम दोनों नि:शब्द बैठे रहे।
वह फिर से शुरू हुआ।
कुछ साल बाद बावरी को लगने लगा था हमें कोई संतान नहीं होगी। फिर भी उसे विश्वास था कि उसकी तपस्या से सांसर औरतों को इस कुत्सित शाप से मुक्ति मिल जाएगी। इंद्र का नाम आते ही उसकी आँखों में रोष भर आता था। एक गीत था, वह कहा करती उनके यहाँ जब भी कोई मेहमान आता, औरतें हमेशा गाती थी। उस गीत से उसे नफ़रत थी।
कुछ ऐसे था- “आओ सजाऊं थारी सेज पधारो म्हारा पावना जी ! तारो इंदर जी को साप बधाओ म्हारी नावना जी!”
उसने मेरी तरफ देखा। “यह समझ में नहीं आया होगा, क्यों? इसका मतलब है आओ अतिथि आओ, मैं तुम्हारी सेज सजाऊं। आओ इंद्र का शाप उतारो और हमारा वंश बढ़ाओ। यह बताते हुए बावरी की आँखों में ऐसे खून उतार आया था, जैसे वह स्वयं ही गौरा थी।”
“एक गाँव है बाघोत, जहाँ शिव जी का मेला लगता है शिवरात्रि को, सुना है कभी?” उसने अचानक बात का रुख़ बदल दिया।
एक झुरझरी सी मेरी रीढ़ से होती हुई पैरों तक गयी। मैं उसके चेहरे को देर तक घूरता रहा। यहाँ बंबई में मेरे घर के पास आ गया है। और अब अचानक मेरे पुश्तैनी गाँव की तरफ बढ़ रहा है। कौन है यह? मेरे सुदूर अतीत से तो कोई चल कर नहीं आया है? नहीं, बिल्कुल नहीं। ऐसा संभव नहीं है। मुझे लगा समय सीधी रेखा में नहीं, वृतीय चलता है।
क्रमश: जारी..
