रणघोष की सीधी सपाट बात :अपने वार्डों को अतिक्रमण से आजाद कराए पार्षद, वन वे सिस्टम की जरूरत नहीं पड़ेगी

पार्षदों का शोर उसी तरह है जिस तरह मदारी डमरू बजाकर भीड़ जुटा लेता है और बंदर से इंसानी जैसी हरकतें करवाकर अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ कर आगे दूसरी जगह चला जाता है। पार्षदों के सुझाव खुद की उपस्थिति दर्ज कराने के तौर पर नजर आ रहे है। अधिकांश सुझाव जमीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहे हैं  वे प्रशासन को यह बताना चाहते हैं हमारी भी कोई भी हैसियत है, हमारी भी सलाह ले अधिकारी।


रणघोष खास. सुभाष चौधरी

शहर को जाम से आजाद कराने के लिए जितने प्रयोग किए गए उतने नासा ने मंगल ग्रह पर पहुंचने के लिए नहीं किए। इन दिनों शहर के पार्षद शहर में प्रयोग के तौर पर लागू वन वे सिस्टम के फायदे- नुकसान का रजल्ट बताने के लिए एकजुट नजर आ रहे हैं। पार्षदों के बयानों एवं दिए गए सुझावों से ऐसा लगता है मानो वे वन वे सिस्टम् से कम अपनी लगातार हो रही अनदेखी से ज्यादा परेशान है। इसलिए उन्हें बार बार यह कहना पड़ रहा है कि प्रशासन शहर की समस्याओं को लेकर उन्हें भी चर्चा में शामिल करें। उनका यह सवाल वाजिब है लंबे संघर्ष उठा पटक के बाद पांच साल में एक बार सभी तरह के हथकंडों के रास्तों पर चलकर पार्षद बनते हैं। ऐसे में अधिकारी उनकी अनदेखी करें तो जनता अपने जनप्रतिनिधि के नेतृत्व क्षमता को कमजोर कहेगी। पार्षदों ने वन वे सिस्टम में खामियों को लेकर कई तरह के सुझाव दिए जिसमें अधिकांश समझ से बाहर थे। उन्होंने सुझाव दिया वाहन एक दिशा में डिवाइडर के दोनों ओर की सड़क पर दौड़ रहे हैं जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। एक तरफ बाई ओर ही चलाया जाए। ऐसे में सवाल उठता है कि दूसरी दाई तरफ की  सड़क का क्या करें। क्या उसे आवारा पशुओं एवं पैदल चलने वालों के लिए अमल में लाए। कायदे से अगर वन वे सिस्टम को सफलता मिल रही है तो सड़क के बीच डिवाइडर ही खत्म कर दें। दूसरा उन्होंने सुझाव दिया कि दोपहिया वाहनों, स्कूल वैन, एंबुलेंस व बीमार व्यक्ति को ले जा रहे वाहनों को छूट दी जाए। अगर यह छूट दी जाती है तो वे वन वे सिस्टम लागू करने का मतलब क्या रह गया। हर रोज हजारों की संख्या में दोपहिया वाहन सरकुलर रोड से शहर के अंदर बाजार व गली मोहल्लों से गुजरते हैं। जब वे सरकुलर रोड पर आएंगे ओर उन्हें दूसरे क्षोर जाने के लिए वन वे सिस्टम से दौड़ रहे वाहनों को बार बार इन दोपहिया वाहनों के लिए रोकना पड़ेगा। रही बात स्कूल वैन की। शहर का सरकुलर रोड  चारों तरफ से अंदर बाहर स्कूल एवं अस्पतालों से बुरी तरह घिरा हुआ है। रणघोष की जुटाई रिपोर्ट के मुताबिक शहर के सरकुलर रोड, माडल टाउन, सेक्टरों को मिलाकर छोटे- बड़े प्राइवेट अस्पतालों की संख्या 150 के आस पास पहुंच चुकी है। इसी तरह 100 के आस पास प्राइवेट स्कूल ऐसे हैं जो आस पास गांवों में होने के बावजूद उनकी बसें शहरों के गली मोहल्लों से बच्चों को सर्विस देती हैं। इन बसों का प्रतिदिन सुबह शाम आना जाना जरूरी है। अगर इन्हें छूट मिलती है तो फिर वन वे सिस्टम कहां रह गया। एंबुलेंस के लिए तो हर तरह की छूट अनिवार्य है यह किसी की जिंदगी बचाने का मसला है।  ऐसे में पार्षदों ने दो दिनों में सुझाव के तोर पर जो पसीना बहाया वह जमीनी हकीकत की साफ सुथरी तस्वीर पेश नहीं कर रहा है। पार्षदों ने कहा कि कारें बाजार एवं गलियों में घुस जाती है इस वजह से जाम लग जाता है। क्या शहर के अंदर रहने वाले चौपहिया वाहन नहीं रख सकते। या तो पार्षद उन पर बैन लगवाए। वे अपना वाहन घर के आगे खड़ा नहीं करेंगे तो कहां करेंगे। कुल मिलाकर पार्षद अगर सच में शहर को जाम से निजात दिलाना चाहते हैं तो उन्हें सलाह देने की बजाय उदाहरण बनना चाहिए। जिस तत्परता एवं जिम्मेदारी के साथ पार्षद एकजुट हुए उन्हें चाहिए वे अपने वार्डों को अतिक्रमण से आजाद कराए। जिस दिन एक भी वार्ड अतिक्रमण- अवैध कब्जे से मुक्त हो गया उसी दिन वह पार्षद शहर का रीयल हीरो कहलाएगा। उसे सुना जाएगा, उसकी सलाह को गंभीरता से लिया जाएगा नहीं तो इस तरह का शोर उसी तरह है जिस तरह मदारी डमरू बजाकर भीड़ जुटा लेता है और बंदर से इंसानी जैसी हरकतें करवाकर अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ कर आगे दूसरी जगह चला जाता है।

आसान नहीं है अतिक्रमण हटाना, वोट टूटने के डर से रहते चुप

शहर में अतिक्रमण हटाना बड़ी बात नहीं है वोटों की राजनीति ने उसे इतना मजबूत कर दिया है कि चाहते हुए भी कोई पार्षद, अधिकारी एवं छोटे- बड़े जनप्रतिनिधि आगे नहीं आते। इसलिए अतिक्रमणकारियों के हौसलों में हमेशा उड़ान रहती है। ऐसे में अपनी खामियों को पर्दा डालने के लिए पार्षद से लेकर सभी छोटे बड़े नेता दिखावे की कार्रवाई को  मीडिया में आसानी से छपवा कर अपने छिपे एजेंडे को पूरा कर लेते हैं। जनप्रतिनिधि यह भूल जाते हैं कि जानबूझकर अतिक्रमण करने वालों की संख्या ना के बराबर है। कार्रवाई नहीं होने पर देखा देखी अन्य को भी अतिक्रमण करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। समान कार्रवाई होने पर मुश्किल से 5 से 10 प्रतिशत नाराज होंगे लेकिन 90 प्रतिशत से ज्यादा खुश। लेकिन हो रहा है उलटा।

 सुझाव: जो दुकानदार उदाहरण है उसे सम्मानित तो करिए

ऐसा नहीं है कि सभी दुकानदार अतिक्रमण या अवैध कब्जा करने की फिराक में रहते हैं। 100 में से आधे  ऐसे भी है जो अपनी हद में रहकर अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। नप के पार्षदों, चेयरपर्सन एवं अधिकारियों को चाहिए कि वे ऐसे दुकानदारों की पहचान कर उन्हें समय समय पर सम्मानित करें। उसकी दुकान की दीवार पर लिखवाए अतिक्रमण के खिलाफ आपर्क कर्तव्य पर हम गर्व करते हैं। ताकि ये दुकानदार गर्व के साथ अपने ग्राहकों एवं परिवार के सदस्यों को बता सके कि ईमानदारी एवं जिम्मेदारी के साथ चलने वालों का आज भी सम्मान है। इससे अतिक्रमण करने वालों को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी मानसिकता बदलने से ही बेहतर बदलाव आएगा।