रणघोष की सीधी सपाट बात

दक्षिण हरियाणा में कमजोर  नेतृत्व की सजा भुगत रहे किसान


–  सोनीपत- पानीपत- रोहतक- हिसार का मुआवजा रोक कर दिखाए अधिकारी


रणघोष खास. सुभाष चौधरी


 दक्षिण हरियाणा के गुरुग्राम- रेवाड़ी जिले में उबाल खा रहे किसानों को अधिकारी से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने नसीहत दी है कि  यह इलाका कमजोर नेतृत्व का शिकार हो चुका है। यह तभी जागता है जब बहुत कुछ गवां चुका होता है। यहीं कारण है कि यहां के नेताओं में इतना दमखम नहीं है कि वे चंडीगढ़ में डंके की चोट पर यहां की आवाज को ताकत के साथ रख सके। इसी वजह से  अधिकारी सोनीपत- पानीपत- रोहतक- हिसार जिलों में मजबूत नेतृत्व के कारण किसानों के मुआवजा को रोकने या जानबूझकर देरी करने की हिम्मत नहीं दिखा पाते हैं वहीं दक्षिण हरियाणा में तस्वीर एकदम उलट है। एक साल से रेवाड़ी के किसान एचएसआईआईडीसी से मुआवजा को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। डीआरओ 15 बार रिमाइंडर भेज चुका है। पिछले 20 दिनों से भाजपा- जेजेपी के छोटे बड़े नेता चंडीगढ़ से यह जानकारी भी हासिल नहीं कर पाए कि किस वजह से मुआवजा नहीं मिल पा रहा है। इसी तरह मानेसर में कम मुआवजा को लेकर किसान आंदोलनरत है। दोनों ही जिलों में किसानों को जगाने व संघर्ष करने के लिए बाहर से नेताओं को बागडोर संभाली पड़ रही है। शुक्रवार शाम किसान नेता राकेश टिकैत बावल पहुंचे और जिले के किसानों को संबोधित किया। भाकियू चढुनी के स्थानीय प्रधान समे सिंह भी मानते हैं कि जो जज्बा व हिम्मत जाट बैल्ट के किसानों  में हैं हमारे यहां स्थिति एकदम उलट सी नजर आती है। इसलिए कई बार ना तो हमें अधिकारी गंभीरता से लेते हैं और ना हीं किसानों में वह करंट आता है इसलिए किसान आंदोलन में इस इलाके की जो भूमिका होनी चाहिए थी वह नजर नहीं आईं। यहां बता दें की किसान नेता योगेंद्र यादव भी यहां के किसानों को नसीहत दे चुके हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार पानीपत- सोनीपत- रोहतक व हिसार में भी अलग अलग परियोजना के तहत जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। उसमें अवार्ड होने के बाद अधिकारियों की हिम्मत नहीं रहती की वे अलग अलग कारणों से मुआवजा में देरी कर दें। अधिकारियों ने माना कि इन जिलों के किसानों को इसलिए प्राथमिकता पर रखना होता है कि यहां के नेता व मंत्रियों पर किसानों का अच्छा खास असर रहता है। इसलिए चंडीगढ़ में जो जितना ज्यादा शोर मचाता है  सुनवाई उसी की होती है। यह राजनीति व सरकार  में मनो वैज्ञानिक दबाव का परिणाम होता है। दक्षिण हरियाणा के नेताओं में बात रखने व कहने में उदारता ज्यादा गंभीरता कम होती है। इसलिए उसका असर भी कम पड़ता है। इस कारण से दक्षिण हरियाणा  में किसी भी परियोजना या मसले को निपटने में लंबा समय चला जाता है। रेवाड़ी में एक साल से मुआवजा का नहीं मिलना और मानसेर- पटौदी में कम मुआवजा को लेकर समाधान नहीं होना यह साबित करता है कि कमजोर प्रतिनिधित्व की वजह से दक्षिण हरियाणा को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।