समय अपने आने की घोषणा नहीं करता, नहीं तो आज गर्जना होती
– ‘हमें पता नहीं होता कि हम समय का क्या करें? गंवाते रहते हैं – किन्तु फिर भी और समय चाहते हैं!’
रणघोष खास. 2023 की कलम से
पीछे मुड़कर न देखना बहुत अच्छा है। किन्तु हम साधारण मनुष्य हैं। देखते ही हैं।कोई कारण तो होगा। अन्यथा सभी पीछे क्यों देखते? बीती बातें, बीत चुकी होती हैं। उनका आगे कुछ नहीं किया जा सकता। किन्तु सीख छिपी होती है हरेक घटना में।
1. यदि करना ही है तो कर डालिए -ख़ुद को ‘कैसे-क्यों…’ से निकालना होगा :
जिस काम को लेकर हम स्वयं विश्वस्त नहीं हैं कि करना चाहते भी हैं या नहीं, वो तो फिर क्या होगा, कैसे करेंगे, क्यों सब स्वीकार करेंगे, हो सकेगा या नहीं -की जांच से गुजरेगा। आगे-पीछे सोचना पड़ेगा। जिसे ‘कास्ट-बेनिफिट रेशो’ कहते हैं- वह देखना पड़ेगा। किन्तु जो करना ही है – उसे तो भिड़कर, कर ही डालिए। एक बार हो जाता है, तो हो ही जाता है।जीवन में भी।बीते बरस में मैंने कितनी ही अच्छी चीजें करनी चाहीं। किन्तु वही – दोहराता हूं – ‘महत्वाकांक्षा ने चूहे की भांति बिल से मुंह बाहर निकाला और बिल्ली की पदचाप सुनकर वापस।’किन्तु, मैं अपने भीतर जब झांककर देख रहा हूं – तो पा रहा हूं कि बिल्ली की पदचाप को मैंने अपनी अकर्मण्यता की चुप्पी पर लाद लिया था। निश्चित ही मेरी महत्वाकांक्षा, मात्र एक वैचारिक आकांक्षा थी। धड़ाम से गिरना ही था।
2. अत्याचार का अंत करना है -तो ख़ुद को लड़ना होगा :
मानव जाति के जन्म के साथ ही शासक और शासित श्रेणियां बन गईं। किसने बनाईं? प्रकृति ने सभी को समान बनाया। मनुष्य ने अपनी शक्ति, बुद्धि और स्वार्थ से शोषण करना शुरू कर दिया। शोषितों ने शोषण स्वीकार कर लिया। इसी से शोषक पनप गए।जीवन में भी कोई और अत्याचार, अन्याय या अराजकता फैलाने का दोषी नहीं है।मैंने सोचकर देखा, और शर्मिन्दा हुआ कि पिछले कई वर्षों में मैंने अन्याय सहे। और किसी और को दोषी मानता रहा। अत्याचार सहने वाले पर ही किए जाते हैं। लड़ाई कोई भी हो – लम्बी ही होती है।’ लड़ाई अनेक प्रकार की होती है। इसलिए पता नहीं चलता। किन्तु जब हम स्वयं खड़े होते हैं- तो मर जाने का भी अपना अदांज़ होता है। ग़ज़ब होता है।
3. हार-जीत से ऊपर उठना है – तो ख़ुद को वैसा बनाना होगा
हमें बचपन से ही सफल होने के लिए क्यों सिखाया जाता है? यह आज तक समझ में नहीं आया। जबकि विफलता ही जीवन भर ज्यादा होती है और जुड़ी रहती है। विफलता को, विफल को हेय दृष्टि से देखा जाता है। तो हम बचपन से बड़े होने तक घबराते रहते हैं। हमें कोई सिर्फ लड़ते रहने के लिए क्यों नहीं समझाता? खेल में जीत किसी एक ही की होगी- इसलिए खेलने का आनंद क्यों नहीं उठाने दिया जाता? क्या हार-जीत से ऊपर वास्तव में उठा जा सकता है? या केवल यह हारने वालों को सांत्वना देने वाली निरर्थक, झूठी, उपदेशात्मक बात है?
4. हारने का दोष किसी पर मत थोपिए -ख़ुद को ही तैयार करना होगा :
हारने के कारणों का पता लगाने की परम्परा मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है। जीत की समीक्षा नहीं होती। उत्सव होते हैं। और हारने वालों के पास बड़े अच्छे और महत्वपूर्ण बिन्दु होते हैं कि किसके दोष से वे हारे।हम मनुष्यों की क्या हैसियत, जब प्लूटो को प्लैनेट मानने से इंकार कर दिया गया – तो एक वैज्ञानिक ने रोचक किन्तु सारगर्भित टिप्पणी की थी:’ जब से उसे ग्रह के रूप में मान्यता दी गई थी, तब से आज अमान्य होने तक भी प्लूटो सूर्य का एक चक्कर भी पूरा नहीं लगा पाया। बाहर तो होना ही था।’
5. कोई भी संकट आपकी दुनिया खत्म नहीं कर सकता – खुद को उठाना होगा :
संकट जब बढ़ जाते हैं तो हमें अपने अस्तित्व पर ही संदेह होने लगता है। मानवीय दुर्बलता है। किन्तु संकट में ही हमारी सच्ची पहचान होती है। कोई संकट इतना भयावह नहीं है कि आपको ख़त्म कर सके। उठना होगा। आपको ही।मनोबल टूटने के बाद कोई उत्साह से उठ सके, असंभव है। किन्तु उठना ही होगा।न चाहे तो भी विवशता है।तो चाहकर ही क्यों न उठा जाए?वर्ष तो आएंगे। जाएंगे। हम क्या करेंगे, बस यही सच है।आपको श्रेष्ठ ही मिले, इसी प्रार्थना के साथ नववर्ष की बधाइयां।