होई जबै द्वै तनहुँ इक
कहानी भी शाश्वत है (अध्याय 31)
रत्नागिरी पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू करने से पहले मैंने कई देर ऊपर की ओर देखा। ऊँचाई पर स्थित लक्ष्य हमेशा दृष्टि के दायरे में रहता है। उस तक पहुँचने की आशा उत्साह देती है, और ना पहुँच पाने का भय नैराश्य पैदा करता है। मैं जानता था मेरा लक्ष्य ऊँचाई पर नहीं है, मेरा लक्ष्य यात्रा की समाप्ति पर है। मुझे कुछ प्राप्त नहीं करना है। मुझे चलते रहना है, अपनी समाप्ति तक, उन दोनों की समाप्ति तक। इस समाप्ति में ही गति है।
आधे रास्ते पहुँच कर मुझे लगा कोई मेरा पीछा कर रहा है। मुझे उन दोनों की वह चाल याद आ गई, जिसकी मुझे भनक भी नहीं लगी थी। उन्होंने मुझे ढाणी गागड़िया भेजा, और….। रोष ह्रदय से चलकर मेरे हाथ के पंजे तक आ गया था। मैंने दरांती की मूठ को अपने हाथ में जकड़ लिया। मृत्यु किसी की सगी नहीं है। मैं भी तो उसका आखेट हो सकता हूँ। मुझे मृत्यु का भय नहीं था। मुझे भय था, मृत्यु की राह में मारे जाने का।
मैं चाकचौबंद था। दरांती की धार पर अंगुली घुमाई। मेरे पैरों में ऊर्जा भरने लगी। एक हल्का हल्का संगीत मेरे क़दमों के साथ गूँजने लगा। दूर कहीं से नगाड़ों की ध्वनि सुनाई दे रही थी।। मैं चारों तरफ देखता हुआ, आगे बढ़ रहा था।”
” तुम्हें कुछ याद आ रहा है, मेरी बात सुनकर?”
मैंने उससे नज़रें नहीं मिलाई।
मुझे याद आ रही थी, वे अँधेरी रातों की यात्रायें, कनीना से सीहोर की तीन कोस के कच्चे की यात्रायें। माणका की डरावनी बणी से होते हुए, जब झुन्डे आदमी बन जाते थे, खेतों से रथों के घुंघरुओं की घंटियां बजने की आवाज़ आती थी। भय से रोंगटे खड़े हो जाते थे, और हर बार भय की लहर के बाद एक रोमांच की लहर आती थी।
” मौत के साथ अठखेलियाँ करने का रोमांच आज भी याद है तुम्हें। मैं तुम्हारे चेहरे पर चढ़ते उतरते भावों को देखकर कह सकता हूँ। खैर… उसी भय और रोमांच के साथ, हवा में तैरती आकृतियों के साथ चलता हुआ, मैं सावित्री माता के मंदिर तक पहुँच गया।
मैं मंदिर में नहीं गया। मंदिर के पास सबसे ऊँची जगह देख कर एक शिला पर बैठ गया। चाँद की रोशनी ठंडी हो चली थी। चारो तरफ प्रलय की शांति थी। रात का दूसरा पहर समाप्त हो रहा था।
वातावरण में मृत्यु की शांति हो, और मन में शत्रु की प्रतीक्षा हो, तो एक तृण के हिलने का स्वर भी सुनाई देता है। मुझे अब भी दूर से आती क़दमों की आहट सुनाई दे रही थी, और साथ ही घुंघरुओं की धीमी रुनझुन। ये ध्वनियां मेरे पास आती जा रही थी। मेरे मन का भ्रम नहीं है यह। कोई मेरी और बढ़ रहा है। मैं बाघ की तरह चौकन्ना होकर बैठ गया। मुरझाई सी चांदनी में दो आकृतियाँ उभरी। वे दोनों खुद मेरे पास चल कर आ रहे हैं। ‘ नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।’ मगर ऐसा ही हुआ।
आवाज़ आई- ‘मान गए यार, अपनी सांसरणी को लेकर यहाँ पहुँच गया। गज़ब की सुन्दर लग रही है आज तो तेरी सांसरणी।’
मैं खड़ा हो गया। इतने में घुंघरू तेज़ी से बजने लगे। मेरे शरीर में बिजली कौंधने लगी।
” अरे है, है सांसरणी है यहीं। देख, वह आ रही चमकती, धमकती, घुंघरू छमछमाती।” उनमें से एक ने कहा।
मैंने इधर उधर देखा। कोई नहीं था। इतने में आसमान में बिजली चमकी, और एक चीखती हुई आवाज़ आई- ” के देखो सो भंवर जी, चीर कै धर दो दोन्या नै। मैं थारै लै ले कै आई सूँ आज इन पापियां नै।” यह बावरी की आवाज़ थी।
मैंने दरांती निकाली। एक योद्धा की तरह छलांग लगा कर मैं उनके सामने था। वे दोनों हक्का बक्का थे।
” मारो भंवर जी मारो।”
मुझे लगा मेरे कई हाथ हैं और सब में एक एक दरांती है। मैं उन दोनों पर अंधाधुंध प्रहार करने लगा। पूरा वातावरण उनकी चीखों से गूँजने लगा। ख़ून के छीटों की बारिश हो रही थी। मेरे हाथ रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। नगाड़ों की आवाज़ तेज़ हो गई थी। बीच बीच में बावरी की आवाज़ आ रही थी।
” मारो, भंवर जी मारो।”
अचानक घुप अँधेरा हो गया। कुछ दिखाई नहीं दे रह था। अँधेरा शाश्वत है। अनेकों सूर्यों से भी विशाल है अंधेरा। अँधेरा सत्य है। कुछ भी नहीं था, बस मैं और अँधेरा। सोच कर देखो। कुछ नहीं, बस अँधेरा ही अँधेरा है, और तुम। लगेगा यही अंतिम सत्य है। मगर ना कुछ अंतिम है, और ना कुछ अंतिम सत्य।”
यहाँ भी जहाँ हम बैठे थे, अचानक अँधेरा हो गया । पूरी बम्बई की बिजली चली गई थी। वह मुझे दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी आवाज़ भी सुनाई नहीं दे रही थी। मुझे लगा, यही मेरा क्षण है। मैं उठा, और पैरों को ज़रा ज़रा सा धरती पर टिकाता हुआ, अपने घर की ओर निकल पड़ा।
मेरी कल्पना में भी नहीं था कि मैं उसे निमंत्रण दे रहा हूँ। मैंने सोचा था, मैं इससे अब कभी नहीं मिलूँगा, इस कहानी को यहीं समाप्त कर दूँगा। मुझे यह भी नहीं पता था कि आगे की कहानी इस अँधेरे के पार है। अँधेरा ही नहीं, कहानी भी शाश्वत है।
