WhatsApp Commission? Mamata Banerjee attacks Election Commission in Supreme Court | SIR Controversy Explained
Supreme Court में ममता बनर्जी ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग को ‘WhatsApp Commission’ कहा। जानिए क्या है पूरा मामला और कब होगी अगली सुनवाई।
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सुप्रीम कोर्ट में ‘वकील’ बनीं ममता बनर्जी, SIR पर चुनाव आयोग को बताया ‘वॉट्सऐप कमिशन’
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार का दिन उस समय ऐतिहासिक बन गया जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद वकील के रूप में अदालत पहुंचीं और चुनाव आयोग की ओर से जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया के खिलाफ जोरदार दलीलें दीं। न्यायपालिका के इतिहास में यह पहली बार माना जा रहा है कि कोई सिटिंग मुख्यमंत्री खुद अदालत में पैरवी करने पहुंचा हो।
सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने SIR को बंगाल के खिलाफ साजिश करार दिया और सवाल उठाया कि जब 24 वर्षों से यह प्रक्रिया नहीं कराई गई थी तो अब अचानक इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि जहां भाजपा की सरकार है, जैसे असम, वहां यह प्रक्रिया नहीं कराई जा रही, जबकि बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है।
चुनाव आयोग को कहा ‘वॉट्सऐप कमिशन’
ममता बनर्जी ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोलते हुए उसे “वॉट्सऐप कमिशन” तक कह दिया। उनका आरोप था कि आयोग की ओर से मैसेजिंग ऐप के जरिए चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिए जा रहे हैं, जो गंभीर चिंता का विषय है।
कार्यवाही की शुरुआत में ममता ने कहा कि वह राज्य की ओर से उपस्थित हैं। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हल्के अंदाज में कहा कि इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। जब ममता ने अपना पक्ष रखने के लिए 5 मिनट का समय मांगा तो CJI ने उन्हें 15 मिनट का वक्त दिया।
वोटरों के नाम काटने का आरोप
बेंच के सामने बहस करते हुए मुख्यमंत्री ने दावा किया कि 58 लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और उनके पास अपील करने का विकल्प भी नहीं है। उन्होंने कहा कि SIR की प्रक्रिया नए वोटर जोड़ने के बजाय नाम हटाने का माध्यम बन गई है।
ममता ने एक व्यवहारिक समस्या का उदाहरण देते हुए कहा कि शादी के बाद जब लड़कियां ससुराल जाती हैं और पति का सरनेम इस्तेमाल करती हैं, तो इसे नामों का मिसमैच बताकर वोटर लिस्ट से नाम हटाए जा रहे हैं।
गरीब और प्रवासी भी प्रभावित
मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल शादीशुदा महिलाओं ही नहीं, बल्कि रोजी-रोटी के लिए बाहर गए गरीब लोगों के नाम भी सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने अदालत से मांग की कि SIR प्रक्रिया में आधार कार्ड को भी मान्य दस्तावेज बनाया जाए, जिससे लोगों को राहत मिल सके।
नामों में गड़बड़ी की चर्चा पर चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि संभव है अनुवाद में AI का इस्तेमाल हुआ हो और उससे ऐसी समस्या पैदा हुई हो।
“सिर्फ बंगाल को टारगेट किया जा रहा”
ममता बनर्जी ने अदालत में कहा कि अन्य राज्यों में डोमिसाइल और कास्ट सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेज स्वीकार किए जा रहे हैं, लेकिन बंगाल के साथ अलग व्यवहार हो रहा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि चार राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और सिर्फ तीन महीने पहले इस प्रक्रिया को शुरू करना आखिर किस बात की जल्दी दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि फिलहाल फसल कटाई का समय है और लोग यात्राओं में व्यस्त हैं, ऐसे में इतनी बड़ी प्रक्रिया चलाना लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। ममता ने यह भी दावा किया कि इस प्रक्रिया के दौरान 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई बीएलओ बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हैं।
अगली सुनवाई 9 फरवरी को
चुनाव आयोग के वकील ने अदालत से एक सप्ताह का समय मांगा था, लेकिन बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जल्द सुनवाई का फैसला किया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी। माना जा रहा है कि यह केस आने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को और गर्म कर सकता है।