– राव जहां से तीन बार विधायक रहे वही से पिछड़े ?
– सबसे बड़ा सवाल क्या राव को जनता ने नकार दिया है ?
रणघोष खास.सुभाष चौधरी
इस बार के लोकसभा चुनाव परिणाम ने सभी को चौंका दिया। बीजेपी को बहुमत नही मिला लेकिन एनडीए को बहुमत मिल गया ।
अब हम बात करेंगे जयपुर ग्रामीण के शाहपुरा विधानसभा की , जहां पर हुए मतदान से ऐसा लग रहा है की भाजपा का जो वर्चस्व 2003 – 2018 के बीच रहा, अब वो तेजी से कमजोर नजर आ रहा है । गैर भाजपाई इसे समझ चुके हैं लेकिन शायद भाजपाई अब तक नही समझ पाए या जानते हुए भी अनदेखा कर रहे हैं। जयपुर ग्रामीण सीट पर कुछ मतों से भाजपा को विजय मिलने पर लड्डू बांटने लगे । अब आप सोच रहे होंगे की जीतने पर तो लड्डू बांटने ही है इसमें गलत क्या है ? लेकिन गौर करिए शाहपुरा के भाजपा कार्यकर्ताओं जो अपने ही विधानसभा क्षेत्र से राव को जीत नही दिला पाए और लड्डू ऐसे बांट रहे है मानो उन्होंने शाहपुरा से राव को एकतरफा जीत दिला दी । शाहपुरा से राव को 55227 मत मिले , वहीं कांग्रेस के अनिल चोपड़ा को 78446 मत हासिल हुए। दोनों का अंतर 23219 का रहा। आंकड़ा देख कर आप अंदाजा लगा लीजिये की शाहपुरा में न तो मोदी की गारंटी चली ना ही राव की पिछले तीन बार की विधायकी । हालाँकि राव को 2018 के विधानसभा चुनाव में ही जनता ने नकार दिया था और निर्दलीय उम्मीदवार आलोक बेनीवाल को सत्ता की कुर्सी सौंप दी थी। 2023 के विधानसभा परिणाम में भी शाहपुरा से भाजपा का सूपड़ा साफ़ हो गया था और यहां से भाजपा के उम्मीदवार उपेन यादव को मुँह की खानी पड़ी । उपेन यादव को कांग्रेस के मनीष यादव से 112839 मतों से शिकस्त खानी पड़ी थी । भाजपा शाहपुरा के वर्तमान हालात ठीक नही लग रहे है , यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में यहां पर भाजपा को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है ।
वर्तमान भाजपा प्रत्याशी उपेन यादव की मेहनत भी बेकार
पिछले विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद भी भाजपा के उपेन यादव ने अपनी कुशल कार्यशैली और जनता के प्रति प्यार को कम नही होने दिया। प्रतिकूल नतीजों के बावजूद तब से लेकर अब तक लगातार शाहपुरा की जनता के लिए काम किया । समर्पित कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज और उपेन का जनता के प्रति समर्पण भी भाजपा को शाहपुरा से जीत नही दिला पाईं। यदि इस बात को भी दरकिनार कर दे की उपेन का भाजपा में सफर अभी बहुत छोटा है, फिर भी मोदी की गारंटी के बैनर को यहां नुकसान तो हुआ है। ये तो मानना पड़ेगा । उपेन ने शाहपुरा से लेकर बंगाल तक लोकसभा चुनाव के प्रचार में कोई कोर-कसर नही छोड़ी । लेकिन ये सब नाकाफी रहा। अब सवाल उनके नेतृत्व भी खड़ा हो गया है।आने वाले समय में उपेन अब किस किरदार में नजर आएंगे ये तो ये भविष्य के गर्भ में ही छुपा है। फ़िलहाल भाजपा का शाहपुरा में बुरा दौर जारी है ।
आलोक बेनीवाल का पार्टी बदलना भी नही आया काम
2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से टिकट नही मिलने पर आलोक बेनीवाल ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत दर्ज की। 2023 में दोबारा कांग्रेस की अनदेखी झेल कर फिर से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा और भारी मतों से हार का सामना करना पड़ा । बेनीवाल लोकसभा के चुनावी बिगुल से ठीक पहले ही भाजपा में शामिल हो गए थे । पार्टी परिवर्तन का यह गणित किसी को समझ नही आया लेकिन इसका फायदा भाजपा को इस चुनाव में नही हुआ ये तय है । शाहपुरा की जनता ने न तो मोदी की गारंटी को स्वीकारा , ना ही तीन बार विधायक रह चुके राव को सांसद के तौर पर अपनाया और बेनीवाल के दल बदली योजन को तो सिरे से नकार दिया। अब सवाल एक ही है क्या भाजपा फिर से शाहपुरा में अपना वर्चस्व बचा पाएगी ?