“तो क्या जानना चाहते हो? पहला खून मैंने किसका किया था?”

होनी का खेल शुरू ( अध्याय -3)


WhatsApp Image 2022-05-03 at 1.09.30 PM (1)रणघोष खास:  बाबू गौतम 

मन में निश्चय किया कि मैं दोबारा इस आदमी से कभी नहीं मिलूँगा।

लग रहा था जैसे कोई अपशकुन हुआ है। दुर्भाग्य ऐसे ही खींच कर ले जाता है अपनी ओर। किसी अनहोनी से बच जाने जैसा अनुभव हो रहा था। मात्र 50  रुपये खोकर।

मैंने यह बात घर में किसी को नहीं बताई। सोने लगा तो लाइट बंद करते ही उसका मुस्कुराता चेहरा फिर आँखों के सामने गया।

जो लोग बर्बाद हो चुके होते हैं, उन्हें दूसरों की बर्बादी में अपार आनंद की अनुभूति होती है।

सोच रहा था कि ना जाने क्यों मुझे जगमाल के साथ हुए वाकये की याद गयी।

तीन लोग और थे जगमाल के साथ जब वह उस रात कनीना स्टेशन पर उतरा। ज़ोर का तूफान आया था, रह रह कर बिजली कौंध रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट से कलेजा फटता था। कनीना से रात के डेढ़ बजे मानका की बनी से होते हुए सीहोर तक तीन कोस जाना था। जगमाल को जान प्यारी लगी और मुसाफिरखाने में रातगुज़ारा कर सुबह गाँव जाने का फ़ैसला लिया। बाकी तीनों रात में ही निकल गये।

मूसलाधार बारिश हुई। जगमाल को अपना फ़ैसला सही लगा। पर नहीं। वे तीनों तो रात को जैसे तैसे पहुँच गये। जगमाल दूसरे दिन सुबह स्टेशन के मुसाफिरखाने में पड़ा मिला। मुर्दा।

अनहोनी कुछ नहीं होती है। बस होनी होती है। कुछ करना या करने से बचना, होनी किस में छुपी है, कोई नहीं जानता।

मैंने खुद को कहा, “धत्तअपने आपको कहानीकार कहते हो तुम! इतनी सी आशंका से घबरा गये। क्या होगा? चार झूठी सच्ची कहानियाँ ही तो बताएगा। पाँच सात सौ रुपये ऐंठ लेगा। और क्या हो जाएगा? हो सकता है, पचास लेकर ही भाग गया हो। कल आये ही नहीं।

मैने इरादा किया। जाऊँगा कल। ज़रूर जाऊँगा।

आज वह कहीं नहीं दिखा।

मैं अपनी कार थोड़ी दूर पार्क करके किंग्स सर्कल के फुटपाथ पर दस मिनिट से खड़ा था। उसके मुस्कुराते चेहरे को याद कर मक्कारी की इबारत तलाशने लगा, जो मैं कल नहीं देख पाया था। मेरे मन में जीतने की इतराहट पचास रूपये का धोका खाने के मलाल पर भारी थी। सोचा, यहाँ खड़ा क्या कर रहा हूँ, फुटपाथ पर करीने से बिछी और उदास सी बैठी किताबों पर ही निगाह मार लूँ।

मैंने निगाह एक बार फिर चारों तरफ घुमाई, आते जाते लोगों की टाँगों के बीच से। वह कहीं नहीं था। सीने में हवा भरी तो मैदान मार लेने की एक लहर सी टाँगों से होती हुई मेरे शरीर से गुज़री।

इतने में मेरी पिंडली में बिजली का झटका सा लगा, “चलो!”

इतनी बेसुध में था कि मेरे हलक से हल्की सी चीख निकल गयी। रीढ़ में कपकंपी सी हुई। 

मेरे पैर पर खींच कर चपत लगा कर, एक विशाल मेंढक सा वह अपनी जगह की ओर सरपट निकल गया।

कहाँ था यह? किधर से आया?

कहीं से भी एक असहाय अपाहिज नहीं लग रहा था वह। बल्कि किसी दूसरे ग्रह से आया, एक मेंढकनुमा शक्तिशाली प्राणी लग रहा था।

मेरे पास पहुँचते ही उसने हाथ आगे कर दिया। मैंने सौ का नोट जेब में अलग से रख लिया था।

तो क्या जानना चाहते हो? पहला खून मैंने किसका किया था?”

और क्यों किया था?” मैंने सवाल को ठीक से फैलाया.

हाँ, सौ दिए हैं तो वसूल तो करोगे ही।

तो सुनो, मैंने जिसे सबसे पहले मौत के घर भेजा वह मेरी पत्नी थी।उसने अपनी मुस्कुराहट को एक पल के लिए बंद किया, और फिर खोल दिया।

बहुत ही खूबसूरत थी मेरी पत्नी। हम नौ साल तक साथ रहे। जिस ज़िंदगी के लोग सपने लेते हैं, मैं उसे जी भर कर जी रहा था।

तो फिर तुमने मारा क्यों अपनी पत्नी को?” मेरी आतुरता होंठों पर गयी।

वह हल्के से हँसा, “तुम सोच रहे होगे मेरी पत्नी ने मुझे धोका दिया होगा। बेवफ़ाई की होगी।

बिल्कुल यह विचार मेरे मन में तैर रहा था, पर उसकी स्यानपत से मुझे झुंझलाहट हुई।

 

नहीं, नहींबिल्कुल नहीं। बहुत अच्छी औरत थी। बहुत प्यार करती थी मुझ से। पूरा विश्वास था हमें, एक दूसरे पर। और मैं भी उसे दीवानावार चाहता था।वह रुका।

मरना नहीं चाहती थी वह।

तो फिर….!” मैं बोलता उससे पहले हाथ उठा कर उसने तसल्ली रखने का इशारा किया, और ख्यालों में कहीं दूर चला गया।

बोलब्याह किया था हमने।

बोलब्याह? यह क्या होता है?” 

वह लौट आया।क्या जानना चाहते हो पहले, बोलब्याह क्या होता है? या मैंने अपनी पत्नी को मारा क्यों? सोच लो!” उसकी आवाज़ सख़्त हो गयी थी।

मैं उसका हरामीपन ताड़ गया था। उसे कीमत बढ़ानी थी।

उसे खा जाने वाली नज़रों से घूरा मैंने। उसकी नज़र कहीं ओर थी। अहंकार मेरी छाती में भर आया था।

बोलब्याह!” मैने उसे लताड़ने के स्वर में कहा।

कल जाना…. दो सौ!”

एएए….!” मैं थोड़ा ज़ोर से चिल्लाया।

ज़्यादा समझदार मत बनो, मैं तुम्हें खूब जानता हूँ।वह नहीं रुका।

दो अहम टकराने की झन्न हुई। खेल शुरू हो गया था।

   क्रमश जारी…….