नगर परिषद की अलमारियों से बाहर क्यों नहीं आ रही घोटालों की फाइलें

नप में भ्रष्टाचार करने के फार्मूले सफल रहे, खत्म करने वाले फेल


 रणघोष खास. सुभाष चौधरी


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नगर परिषद के पार्षदों, समस्त अधिकारियों ने एक बार फिर कामकाज को बेहतर बनाने के लिए 18 सूत्रीय फार्मूलों को तैयार कर लागू किया। ऐसा लग रहा था इन फार्मूलों के साथ ही नगर परिषद का जन्म हुआ हो। अगर शहर की इस सरकार के प्रति इतनी ही गंभीरता है तो उसकी अलमारियों में कई सालों से धूल चाट रही घोटालों की फाइलों को टेबल पर रखने की आवाज कहां गायब हो गईं।

नप में जितनी भी बैठके, हंगामा या शोर मीडिया की आंखों व कानों से जनता के पास पहुंच रहा है दरअसल वह खूबसुरत धोखा व छलावा के अलावा कुछ नहीं है। जिन निगरानी कमेटियों का गठन किया गया है उसे बनाने की जरूरत ही नही है जब सूचना के अधिकार, सीएम विंडो व राइट टू सर्विस एक्ट पहले ही लागू हैं। कोई पूछे कि कमेटी बनाने से अगर भ्रष्टाचार रूकते तो अभी तक नप में कमेटियों का गठन व बैठक कर हंगामा करने के अलावा कौनसा ऐसा कार्य हुआ है जिस पर नप का कोई भी पार्षद, अधिकारी या आमजनता गर्व कर सके। सभी पार्षदों, अधिकारी व कर्मचारियों को अच्छी तरह पता है कि नप में जनता को काम करवाने के लिए किन रास्तों से गुजरना पड़ता है। नप कार्यालय की बजाय ऐसी सुरंग बन चुकी है जिसमें एंट्री तो अपनी मर्जी से होती है लेकिन वापसी का कुछ पता नहीं..।

नप में इन घोटालों पर क्या कभी हो पाएगी कार्रवाई

नप में कई तरह के घोटालों कई के साल भर बीतने के बावजूद अभी तक जांच भी पूरी नहीं हुई। किसी मामले में सीएम के कहने के बावजूद जांच शुरू तक नहीं हो सकी। इससे भी अलग जिन मामलों की जांच हुई भी तो उनमें कार्यवाही के नाम पर कुछ नहीं हुआ है। कुछ घोटाले इस प्रकार है।

300 एकड़ जमीन में हजार करोड़ का है घोटाला

टाउन एवं कंट्री प्लानिंग विभाग में सेक्टर 6 और 7 की 299.46 एकड़ जमीन में करीब 1 हजार करोड़ रुपये घोटाले की शिकायत पिछले साल 22 सितंबर 2015 को की गई थी। मामले में गुड़गांव के भूमि अर्जन संपदा अधिकारी ने 22 मार्च 2016 को ही अपनी जांच रिपोर्ट भी फाइल कर दी। जांच में महानिदेशक नगर एवं ग्राम योजनाकार विभाग के तत्कालीन अधिकारियों को दोषी पाया। कार्रवाई शून्य।

नप में जांच पर जांच, सीएम के आदेश भी हवा

नगर परिषद रेवाड़ी में कांग्रेस समर्थित नपा प्रधान और 17 नपा अधिकारियों के खिलाफ विभिन्न भ्रष्टाचार की शिकायतों में करीब 25 करोड़ रुपये के गबन की शिकायत पिछले साल 26 मार्च 2015 को हुई थी। मामले में नगराधीश और एसडीएम ने जांच की और आरोपों को सही पाया। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। यही नहीं मामले में एडीसी जांच, राज्य चौकसी ब्यूरो और महालेखाकार की जांच तो शुरू भी नहीं हुईं। वह भी जब सीएम खट्टर ने खुद राज्य चौकसी ब्यूरो से मामले में जांच कर रिपोर्ट सौंपने को कहा था। वहीं नप के प्रॉपर्टी टैक्स असेस्मेंट मामले में 66 लाख रुपये घोटाले की अक्तूबर 2015 की शिकायत पर एडीसी की जांच अभी तक पेडिंग ही है।

वक्फ बोर्ड की जांच में साल भर पहले तहसीलदार निकला दोषी

वक्फ  बोर्ड की जमीन पर 100 करोड़ रुपये के घोटाले मामले में 31 मार्च 2015 को शिकायत हुई थी। मामले की जांच सीटीएम और जिला राजस्व अधिकारी ने करने के बाद पिछले साल ही अप्रैल महीने में रिपोर्ट सौंप दी थी। रिपोर्ट में वक्फ बोर्ड तहसीलदार को दोषी पाया गया था। बावजूद इसके कार्रवाई नहीं हुई।

एक ही कंप्यूटर से किए आवेदन

2017 में नगर परिषद द्वारा जून माह में छोड़े गए 19 करोड़ रुपये के टेंडर में घालमेल ठेकेदारों द्वारा पूल बनाकर किया गया। यानि एक साथ बैठकर ठेकेदारों ने टेंडर के लिए आवेदन किया जिससे कहीं न कहीं बड़ी मिलीभगत सामने आई। कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ।

स्टांप ड्यूटी घोटाला

2015 में तथ्य छुपाकर लाखों की स्टांप ड्यूटी हड़पने का मामला सामने आाया था। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने 6 फरवरी 2015  को इसकी विजिलेंस जांच के आदेश दिए थे। अब विजिलेंस टीम इसकी जांच शुरू कर चुकी है। तहसील कार्यालय से रिकार्ड तलब किया जा चुका है। नगर परिषद से उन आठ संपत्तियों के अलावा अन्य जरूरी फाइलों को भी विजिलेंस के अधिकारी खंगाल चुके हैं। विजिलेंस को 2012 से 2014 तक नगर परिषद द्वारा स्वीकृत किये गये सभी कामर्शियल नक्शों की जांच  का पता  ही नहीं चला है। स्टांप ड्यूटी की चोरी आम बात है। इस मामले में जांच करने वाले अधिकारी पर भी सवाल उठते रहे हैं।