Explainer: कड़वी मिठास, चीनी का सरप्लस हुआ गायब! त्योहारों से पहले भारत में कमी का डर क्यों?

त्योहारों से पहले देश में चीनी के दाम आसमान छू रहे हैं। आज देश के बड़े शहरों में चीनी खरीदना दो हफ्ते पहले के मुकाबले करीब 40 फीसदी महंगा हो गया है। पिछले साल अगस्त में चीनी 44 रुपये किलो बिक रही थी, लेकिन आज चीनी के रेट 65 से 70 रुपये किलो तक पहुंच गए हैं। कीमत बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह बाजार में चीनी की कमी है। सरकार भी त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले चीनी का पर्याप्त स्टॉक तैयार करने की कोशिश कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ एक साल के अंदर देश में चीनी की स्थिति पूरी तरह बदल गई है। कुछ महीने पहले तक देश में चीनी के उत्पादन को लेकर तस्वीर बिल्कुल अलग थी। उस समय इस सीजन में रिकॉर्ड उत्पादन और बड़े सरप्लस की उम्मीद की जा रही थी।

सरप्लस का अनुमान कैसे कमी में बदला?

चीनी का मौजूदा मौसम 1 अक्टूबर 2025 से शुरू हुआ है और 30 सितंबर 2026 तक चलेगा। इसकी शुरुआत में सरकार और चीनी उद्योग को उम्मीद थी कि इस साल चीनी का उत्पादन बढ़ेगा। साथ ही, इथेनॉल बनाने के लिए चीनी का इस्तेमाल कम होने की संभावना थी। उस समय चीनी मिलें सरकार से ज्यादा चीनी निर्यात करने की अनुमति भी मांग रही थीं। इसका मकसद बाजार में चीनी का अतिरिक्त भंडार कम करना और गन्ना किसानों का बकाया समय पर चुकाना था। लेकिन अब स्थिति इसके उलट हो गई है। चीनी की उपलब्धता कम होने से कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और त्योहारों से पहले सरकार के सामने चीनी का पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।

भारत में चीनी उद्योग की संस्था इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (इस्मा) ने जुलाई 2025 में अपना पहला अनुमान जारी किया था। इसमें कहा गया था कि 2025-26 के चीनी सीजन में देश में करीब 3.49 करोड़ टन चीनी का उत्पादन हो सकता है। यह पिछले सीजन के 2.96 करोड़ टन उत्पादन से करीब 18.3 फीसदी ज्यादा था। सितंबर में हुई संस्था की सालाना बैठक में भी इस अनुमान को दोहराया गया। उत्पादन बढ़ने की उम्मीद को देखते हुए सरकार ने सीजन की शुरुआत में ही चीनी मिलों को निर्यात की अनुमति दे दी। यह पिछले सीजन के मुकाबले बड़ा बदलाव था।

2024-25 सीजन में सरकार ने जनवरी 2025 में सिर्फ 10 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी। वहीं, 2025-26 सीजन में नवंबर 2025 में, यानी सीजन शुरू होने के कुछ ही समय बाद, सरकार ने पहले चरण में 15 लाख टन चीनी के निर्यात को मंजूरी दी। इसके बाद फरवरी में 5 लाख टन अतिरिक्त चीनी निर्यात करने की अनुमति दी गई। उस समय सरकार को उम्मीद थी कि देश में चीनी का उत्पादन पर्याप्त रहेगा और निर्यात के बावजूद घरेलू बाजार में इसकी कमी नहीं होगी।

लेकिन मई आते-आते चीनी उत्पादन और उपलब्धता को लेकर सरकार के अनुमान बदल गए। इसके बाद सरकार ने अपनी नीति में बड़ा बदलाव किया। मई में सरकार ने घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने का हवाला देते हुए 30 सितंबर तक चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी। जुलाई तक सरकार ने चीनी मिलों और कारोबारियों पर निगरानी और नियंत्रण भी बढ़ा दिया।

100 रुपये किलो तक पहुंचा दाम

अगस्त में सरकार ने चीनी मिलों के लिए मासिक बिक्री कोटा 22.5 लाख टन ही रखा। यह पिछले साल के बराबर था। हालांकि, त्योहारों का मौसम करीब आने के कारण बाजार में हर महीने 23 से 24 लाख टन चीनी की मांग रहने की उम्मीद थी। इस बीच चीनी की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में मिलों से सीधे बिकने वाली चीनी की कीमत जून के आखिर से बढ़ रही थी। अगस्त के पहले हफ्ते में यह कीमत 4,880 से 4,980 रुपये प्रति 100 किलो तक पहुंच गई।

इसके बाद 18 अगस्त को चीनी की कीमत ने नया रिकॉर्ड बना दिया। उस दिन कीमत 5,350 रुपये प्रति 100 किलो तक पहुंच गई। अगले ही दिन उत्तर प्रदेश में मिल से निकलने वाली चीनी की कीमत 5,850 रुपये प्रति 100 किलो हो गई। एक हफ्ते पहले यही कीमत करीब 4,830 रुपये प्रति 100 किलो थी। यानी कुछ ही दिनों में चीनी की कीमत में बड़ी बढ़ोतरी हुई, जिससे त्योहारों से पहले आम लोगों पर महंगी चीनी का बोझ बढ़ने की आशंका है।

चीनी की कीमतों में अचानक और तेजी से हुई बढ़ोतरी के बाद सरकार ने 19 अगस्त की देर रात चीनी के स्टॉक को लेकर नियम और सख्त कर दिए। नए नियमों के तहत बड़े औद्योगिक खरीदार सितंबर से अपनी जरूरत के 15 दिनों से ज्यादा की चीनी का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। इसके बाद सरकार ने करीब 10 साल में पहली बार चीनी के आयात को मंजूरी दी। साथ ही, चीनी पर लगने वाला 100 फीसदी आयात शुल्क हटा दिया गया। 20 अगस्त को सरकार ने 10 लाख टन चीनी आयात करने की अनुमति भी दे दी। इसी दिन कर्नाटक की चीनी मिलों में कीमत बढ़कर 7,100 रुपये प्रति 100 किलो तक पहुंच गई।

अब सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि चीनी का बाजार इतनी तेजी से बदल गया?

अतिरिक्त स्टॉक की कमी में कैसे बदला?

चीनी के मौजूदा सीजन के आंकड़ों को देखें तो पूरी स्थिति आसानी से समझी जा सकती है। शुरुआत में देश में चीनी की जरूरत से ज्यादा उपलब्धता की उम्मीद थी, लेकिन बाद में उत्पादन के अनुमान लगातार कम होते गए। नवंबर में इस्मा ने चीनी उत्पादन का अनुमान थोड़ा घटाकर 3.435 करोड़ टन कर दिया। इसमें से करीब 34 लाख टन चीनी इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने की उम्मीद थी। यानी खाने और घरेलू इस्तेमाल के लिए करीब 3.1 करोड़ टन चीनी बचने का अनुमान था।

सीजन की शुरुआत में देश के पास करीब 50 लाख टन चीनी का पुराना स्टॉक भी था। इसे जोड़ने पर कुल उपलब्ध चीनी करीब 3.6 करोड़ टन होने का अनुमान था। वहीं, देश में चीनी की घरेलू खपत करीब 2.85 करोड़ टन रहने की उम्मीद थी। इस हिसाब से देश में जरूरत से काफी ज्यादा चीनी बचने की संभावना थी। इस्मा का अनुमान था कि इस अतिरिक्त स्टॉक में से कम से कम 20 लाख टन चीनी का निर्यात किया जा सकता है। लेकिन इसके बाद उत्पादन के अनुमान लगातार कम होते गए।

फरवरी में इस्मा ने चीनी के कुल उत्पादन का अनुमान और घटाकर 3.24 करोड़ टन कर दिया। यह पहले के अनुमान से करीब 30 लाख टन कम था। इतनी कमी देश की करीब एक महीने की चीनी खपत के बराबर है। इसी के साथ इस्मा ने खाने और घरेलू इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होने वाली शुद्ध चीनी का अनुमान भी घटाकर 2.93 करोड़ टन कर दिया। संस्था के मुताबिक, करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने की उम्मीद थी। इस तरह कुछ ही महीनों में चीनी के अतिरिक्त स्टॉक का अनुमान काफी कम हो गया और बाजार में भविष्य में कमी की चिंता बढ़ने लगी।

अप्रैल में चीनी के कुल उत्पादन का अनुमान एक बार फिर घटाकर 3.2 करोड़ टन कर दिया गया। अब सरकार 2025-26 के पूरे सीजन में देश में करीब 3.06 करोड़ टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान लगा रही है। इसमें से करीब 29 लाख टन चीनी इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने की उम्मीद है। इसके अलावा करीब 8 लाख टन चीनी का निर्यात भी किया जा चुका है। इन दोनों को घटाने के बाद देश में घरेलू इस्तेमाल के लिए करीब 2.69 करोड़ टन चीनी बचेगी। यह मात्रा देश की अनुमानित 2.85 करोड़ टन खपत से करीब 16 लाख टन कम है।

हालांकि, पिछले सीजन से बचा हुआ चीनी का स्टॉक इस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है। यानी सीजन की शुरुआत में मौजूद पुराना स्टॉक अभी भी देश में चीनी की कुल उपलब्धता बढ़ाने में मदद करेगा। इस बीच, अप्रैल के अनुमान से काफी पहले ही एक दूसरी चीनी संस्था ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (एआईएसटीए) ने उत्पादन को लेकर चिंता जताई थी।

मार्च के पहले हफ्ते में एआईएसटीए ने 2025-26 सीजन के लिए शुद्ध चीनी उत्पादन का अनुमान घटाकर 2.83 करोड़ टन कर दिया था। इस आंकड़े में इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी को शामिल नहीं किया गया था। संस्था ने बताया कि देश के दो बड़े चीनी उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ने की पैदावार कम रहने की वजह से उत्पादन का अनुमान घटाना पड़ा।

इथेनॉल का कितना असर?

चीनी की मौजूदा स्थिति को समझने में इथेनॉल नीति की बड़ी भूमिका है। इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि गन्ने से बनने वाली चीनी में से कितनी मात्रा बाजार में खाने के लिए उपलब्ध रहेगी और कितनी इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होगी। 2025-26 के चीनी सीजन की शुरुआत में उम्मीद थी कि इथेनॉल बनाने के लिए इस बार बड़ी मात्रा में चीनी का इस्तेमाल किया जाएगा। चीनी उद्योग का अनुमान था कि करीब 45 से 50 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हो सकती है।

लेकिन तेल कंपनियों ने 2025-26 के इथेनॉल सप्लाई वर्ष के लिए चीनी से बने कच्चे माल से सिर्फ 290 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने का आवंटन किया। इसका मतलब था कि इथेनॉल बनाने के लिए चीनी की खपत शुरुआती अनुमान से काफी कम रह सकती है। इस्मा ने पहले अनुमान लगाया था कि इथेनॉल बनाने में करीब 32 से 34 लाख टन चीनी इस्तेमाल होगी। अब यह अनुमान करीब 30 लाख टन का है। यानी शुरुआत में जितनी चीनी इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने की उम्मीद थी, उससे कम चीनी वास्तव में इस काम में गई।

आमतौर पर इसका मतलब यह होना चाहिए कि इथेनॉल में कम चीनी इस्तेमाल होने से घरेलू बाजार के लिए ज्यादा चीनी उपलब्ध होनी चाहिए। लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग रही। जैसे-जैसे चीनी उत्पादन के अनुमान घटते गए, इथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाली कम मात्रा भी बाजार पर दबाव डालने लगी। यानी उत्पादन में आई बड़ी कमी के सामने इथेनॉल के लिए बचाई गई चीनी भी ज्यादा महसूस होने लगी। यही वजह है कि इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल कम होने के बावजूद घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ती गई।

सरकार का कहना है कि चीनी की कीमतों में हुई तेज बढ़ोतरी की वजह इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल नहीं है। सरकार ने 21 अगस्त को जारी बयान में कहा कि चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के पीछे कई दूसरी वजहें हैं। इनमें उम्मीद से कम चीनी उत्पादन, त्योहारों के दौरान बढ़ी मांग, खराब मौसम से फसल को नुकसान, दुनिया भर में चीनी की आपूर्ति की स्थिति और बाजार में कारोबार का तरीका शामिल हैं। सरकार के मुताबिक, इसे इथेनॉल बनाने के लिए चीनी के इस्तेमाल से जोड़ना सही नहीं है। सरकार ने बताया कि इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी था, जो 2025-26 में घटकर करीब 9 फीसदी रह गया है।

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