गुजारा भत्ता केस में बड़ा फैसला: पति की कमाई बढ़ाकर बताने पर पत्नी के खिलाफ नहीं होगा केस

गुजारा भत्ता मामलों पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी, पत्नी के दावे पर नहीं होगा केस

गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) से जुड़े मामलों में Allahabad High Court ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी अपने पति की आय को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है, तो केवल इस आधार पर उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।

यह टिप्पणी जस्टिस Raj Beer Singh की बेंच ने एक याचिका को खारिज करते हुए की।

क्या था पूरा मामला?

मामले में पति ने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी ने अधिक गुजारा भत्ता पाने के लिए उसकी मासिक आय को गलत तरीके से बढ़ाकर पेश किया। पति का दावा था कि उसकी वास्तविक आय मात्र 11 हजार रुपये प्रतिमाह है, जबकि पत्नी ने इसे 80 हजार रुपये बताया।

इस पर अदालत ने कहा कि यह मामला अभी फैमिली कोर्ट में विचाराधीन है, जहां सभी तथ्यों और दावों की जांच के बाद उचित निर्णय लिया जाएगा।

कोर्ट की टिप्पणी: “यह आम धारणा है”

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह आम धारणा रही है कि पत्नियां अपने पति की आय को बढ़ाकर बताती हैं, ताकि उन्हें अधिक गुजारा भत्ता मिल सके।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के दावों के आधार पर पत्नी के खिलाफ न तो Section 340 CrPC और न ही Section 379 Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita के तहत कोई कार्रवाई की जा सकती है।

न्याय के हित में जरूरी है संतुलन

बेंच ने कहा कि अदालत का काम दोनों पक्षों के दावों और तथ्यों की निष्पक्ष जांच करना है। किसी एक पक्ष के आरोप के आधार पर दूसरे पक्ष के खिलाफ केस चलाना न्याय के हित में नहीं होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि न्याय करते समय किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के चक्कर में दूसरे के साथ अन्याय न हो।

पति की याचिका खारिज

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने पति की याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि मामले का उचित निर्णय फैमिली कोर्ट में सुनवाई के बाद ही लिया जाएगा।

दोनों पक्षों द्वारा गलत दावों के उदाहरण

गौरतलब है कि गुजारा भत्ता मामलों में जहां कई बार पत्नियां पति की आय बढ़ाकर बताती हैं, वहीं कई मामलों में पति भी अपनी वास्तविक संपत्ति और आय को छुपाने या कम दिखाने की कोशिश करते हैं।

ऐसे मामलों में अदालत दोनों पक्षों के दावों की गहराई से जांच करती है, ताकि सही और न्यायसंगत निर्णय लिया जा सके।


यह फैसला साफ संकेत देता है कि अदालतें केवल आरोपों के आधार पर कार्रवाई नहीं करतीं, बल्कि हर मामले में तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही निर्णय लिया जाता है।