रणघोष खास. सुभाष चौधरी
राजनीति वसूलों पर नही मौजूदा हालातों को देखकर अपना मिजाज बदलती है। रेवाड़ी विधानसभा सीट पर अपनी अलग हैसियत रखने वाले पूर्व जिला प्रमुख सतीश यादव ने नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी नेहारिका चौधरी को अपना समर्थन देकर मुकाबले को बेहद जटिल बना दिया है साथ ही पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव परिवार की राजनीति को आगे लिए पूरी तरह से उलझा कर भी रख दिया है।
राजनीति की समझ रखने वाले अच्छी तरह से जानते हैं की इस सीट पर कप्तान अजय सिंह यादव का सतीश यादव से छत्तीस से भी बड़ा आंकड़ा रहा है। यहा तक की कप्तान सतीश का नाम सुनते ही आग बबूला हो जाते थे। वह दौर भी आया था जब कप्तान की नजर में सतीश यादव भू माफिया समेत ना जाने कितने बड़े खलनायक थे। आज वही सतीश यादव कप्तान की प्रतिष्ठा का सवाल बने इस चुनाव में मतदान से दो दिन पहले छाया बनकर खड़े हो गए। सतीश के साथ में आ जाने से कांग्रेस को ताकत मिली है इसका कितना फायदा होगा यह तो 13 मई को आने वाले परिणाम से स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन उसके बाद कप्तान हाउस की राजनीति का चेहरा पूरी तरह से बदल जाएगा जिसमें उलझने, बैचेनी ज्यादा रहेगी। सतीश यादव की इतनी ज्यादा उम्र नही है की वे थककर राजनीति को नमस्कार रहे हैं। कप्तान का शरीर जरूर आराम मांग रहा है। उनके सुपुत्र चिरंजीव राव ने कमान भी पूरी तरह से संभाली हुई है लेकिन इस बात में दम बिल्कुल नजर नही आ रहा है की आगे भी इसी तरह एक म्यान में दो तलवारें साथ रहेगी। चिंरजीव राव व सतीश यादव को आगे भी चुनाव लड़ना है। परिस्थितिया भी अलग होगी। जाहिर है जब जनता के बीच जाएंगे तो सतीश के पास जवाब देने के लिए बहुत कुछ रहेगा लेकिन कप्तान परिवार को ये सवाल परेशानी में डाल सकते हैं। सतीश ने कांग्रेस का साथ केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के उस प्रभाव को रोकने के लिए दिया है जिसमें राव लिए जाने वाले निर्णयों में अपने अलावा किसी की नही सुनते है जिसकी वजह से आसान से लगने वाला चुनाव अंत में करो या मरो वाला बन जाता है। राजनीति ने सतीश को अलग अलग वजहों से हार की माला जरूर पहनाई है लेकिन पकाया भी पूरा है। इसलिए सतीश की तरकश में बेशुमार तीर है। 12 सालों से प्रदेश में और 8 सालों से नगर परिषद के अंदर भाजपा की सत्ता रही है। इसके बावजूद शहर बेहाल है। भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी अपने चरम पर रही। इसका जवाब किसी भी भाजपाई के पास नही है। ऐसे में जनता कब तक राव की तरफ से जारी फरमानों पर भरोसा करती रहेगी। इसी सवाल को हथियार बनाकर सतीश ने सही समय पर कांग्रेस का साथ देकर अपनी आगे की राजनीति को मजबूत कर लिया है लेकिन कप्तान के सामने ऐसी परेशानी खड़ी कर दी की जिसका तोड़ आगे चलकर शायद मिल पाए। अगर कांग्रेस इस सीट पर जीत दर्ज करती है तो इसका श्रेय भी बंटकर सतीश के पास चला जाएगा। अगर हार होती है तो इसका पूरा श्रेय कप्तान की रणनीति को जाएगा। यानि सतीश इस चुनाव में पूरी तरह से मुनाफे की राजनीति कर गए और कप्तान को राजनीति के शेयर मार्केट के बाजार में खड़ा कर गए जिसका कुछ नही पता वह क्या करवट लेगा।