हरियाणा में भाजपा खराब माहौल में बेहतर साबित होती रही है..

2014 से आज तक मनोहर की प्रयोगशाला क्यों चल रही है आइए जाने..


 रणघोष खास. प्रदीप हरीश नारायण

 हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा की तरफ से मैदान में उतारे गए उम्मीदवारों को लेकर जो शोर मच रहा है। दरअसल वह केंद्रीय मंत्री मनोहरलाल की राजनीति प्रयोगशाला के साइड इफेक्ट है जो कुछ दिन बाद स्वत: खत्म हो जाएंगे। 2014 से लेकर अभी तक कई बार इस तरह के प्रयोग हो चुके हैं जिनके बेहतर परिणाम ही सामने आए हैं जबकि तस्वीर इससे उल्ट ही मीडिया में आती रही है।

2014 के विधानसभा चुनाव से इसकी शुरूआत करते हैं जब मनोहरलाल का सार्वजनिक तौर पर राजनीति में पदार्पण हुआ। विधायक पद से चुनाव लड़ा। किसी ने सपने में भी नही सोचा था की वे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। कुछ समय बाद प्रदेश में जाट आरक्षण के दरम्यान हुई जातीय हिंसक घटनाओं को लेकर उनके नेतृत्व को कमजोर साबित करने का माहौल खड़ा कर दिया गया। एक बार लगा की उनकी कुर्सी किसी भी समय जा सकती है। कुछ नही हुआ। इसी दौरान पार्टी के भीतर ताकतवर नेता राव इंद्रजीत सिंह, प्रो. रामबिलास शर्मा, अनिज विज समेत अनेक दिग्गजों का सीधे इस नेता पर हमला जारी रहा। 2019 का चुनाव आया तो बजाय मनोहरलाल को हटाने के उनके ही नेतृत्व में जोरदार तरीके से चुनाव लड़ा गया। विरोध करने वाले यही नेता उनका स्वागत करते नजर आए। इस चुनाव में भाजपा बहुमत से कुछ कदम दूरी पर रही। फिर उन्हें हटाने की जोर अजमाइश हुई लेकिन किसी का बस नही चला। जेजेपी के साथ मिलकर सरकार को चलाया। 2024 के लोकसभा चुनाव में जब उन्हें सीएम पद से हटाकर लोकसभा चुनाव में उतारा तो लगा की यह नेता अब हरियाणा राजनीति के मानचित्र से गायब होने जा रहा है। जेजेपी से गठबंधन भी खत्म हो गया। कुछ दिन बाद तस्वीर फिर बदली हुई नजर आईं। मनोहरलाल के कहने पर नायब सैनी को सीएम बनाया गया। इसके बाद यह नेता मोदी सरकार में सबसे ताकतवर ऊर्जा ओर शहरी विकास एवं ऊर्जा मंत्रालय के मुखिया बन गए। साथ ही हरियाणा सरकार का रिमोट कंट्रोल भी उनके पास रहा। सीएम नायब सैनी ने अपनी सरकार के कुछ पुराने फैसलों को बदल दिया। मीडिया में यह माहौल बनाया गया की मनोहरलाल की गलतियों को ठीक किया जा रहा है जबकि सबकुछ इस नेता की प्रयोगशाला से ही तय होकर आ रहा था। लोकसभा चुनाव में प्रदेश में एससी समाज भाजपा से पूरी तरह से दूर हो गया। इसे वापस लाना भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती नजर आ रही थी। भाजपा में समाज से जुड़े विधायक, मंत्री व सांसद नैतिक तोर पर हार मान चुके थे। ऐसे विपरित हालात में मनोहरलाल ने अपने बेहद करीबी सुदेश कटारिया को यह जिम्मा सौंपा। सीएम के चीफ मीडिया कोर्डिनेटर पद पर कार्यरत सुदेश कटारिया ने बिना सरकार ओर संगठन की मंदद के  26 अगस्त को कुरुक्षेत्र के पीपली में राज्य स्तरीय दलित सम्मान स्वाभिमान समारोह में 12 हजार से ज्यादा समाज के लोगों को जुटाकर उन अटकलों को भी खत्म कर दिया की यह समाज भाजपा से पूरी तरह से दूरिया बनाए हुए हैं।

अब विधानसभा चुनाव में टिकट को लेकर जो घमासान नजर आ रहा है। उसमें भी मनोहरलाल  को कुछ सीटों पर खलनायक की तरह पेश किया जा रहा है जबकि एक एक सीटों पर जवाबदेही तय की जा रही है। दक्षिण हरियाणा में राव इंद्रजीत सिंह के कहने पर जो टिकटे दी गईं ओर काटी गईं उसके पीछे भी बड़ी वजह है। हाईकमान लोकसभा चुनाव के आए परिणाम से बने माहौल में  बड़ी विकेट गिराकर चुनावी मनोबल को कमजोर नही करना चाहता। इसलिए राव को एक दायरे में बांधकर उन्हें कुछ सीटों के लिए जवाबदेह बना दिया। इन फैसलों से जो नाराज हो गए उन्हें मनाने के लिए अंदरखाने तैयारी चल पड़ी है। इसलिए मीडिया में मनोहरलाल को लेकर जितनी भी आलोचनाओं से भरी खबरें आ रही हैं दरअसल वह ठीक उसी तरह है जिस तरह बुरी नजर से बचाने के लिए काली हांडी को घर के बाहर छज्जे पर लटका दिया जाता है।