नगर परिषद रेवाड़ी चुनाव की यह रिपोर्ट तस्वीर साफ कर देगी

निर्दलीय उम्मीदवार शकुंतला भांडोरिया ने पद के बदले मैदान छोडा, कहानी खत्म


अब सीधा मुकाबला भाजपा- कांग्रेस के बीच में, विकास नही अब मरोड की लड़ाई


रणघोष खास. सुभाष चौधरी

जिसका कोई ईमान, धर्म नही होता उसे मौजूदा राजनीति कहते हैं। इस तरह की राजनीति इसलिए सफल रहती है की वोट डालने वालों में अधिकांश ने ही  राजनीति के बाजार में अपनी दुकानें खोली हुई हैं। जिसमें सभी ने हैसियत के हिसाब से अपने रेट तय किए हुए हैं। उसी हिसाब से उन्हें प्रत्याशी के तौर पर नेता मिल जाते हैं।

मंगलवार शाम को निर्दलीय उम्मीदवार शकुंतला भांडोरिया वापस अपने घर कांग्रेस में लौट आईं। लाने वाले भी कोई ओर नही पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव है जिन्होंने 4 मई को भांडोरिया के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए थे। 24 घंटे बाद ही कप्तान दरवाजा लेकर भांडोरिया के आवास पर पहुंच गए। भांडोरिया का अंदाज भी यह बता रहा था की वह भी अलग थलग होने की वजह से थक गई थी। इसलिए मैदान छोड़ने के बदले कांग्रेस की तरफ से मिले पद को ही अपना राजनीति मुनाफा मान लिया। किसी ने सही कहा है राजनीति करने वालों का दिल लोहे का होना चाहिए जिस पर तमाम तरह के उतार चढ़ाव  का कोई असर नही पड़े।

अब मुकाबला पूरी तरह से भाजपा- कांग्रेस के बीच रहेगा जिसमें विकास कोई मुददा नही रहेगा। केवल एक दूसरे की मरोड निकालने की लड़ाई रहेगी। अगर विकास की चिंता होती तो दोनों दलों को यहा की जनता ने हमेशा भरपूर सम्मान और समय दिया है। इसके बावजूद इस छोटे से शहर के हालात किसी से छिपे नही है।  

अब यह लड़ाई प्रत्याशियों के बीच नही दो परिवारों की बन गईं

अब यह लड़ाई ना भाजपा व कांग्रेस के बीच होगी और ना ही दोनों प्रत्याशियों के बीच होगी। यह मुकाबला केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह व पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव के बीच होगा। अभी तक चुनाव प्रचार को लेकर जो एक्सरसाइज हुई है वह 5 मई के बाद पूरी तरह से बदल गई है।

अंदरखाने बिखराव का सबसे बड़ा नुकसान भाजपा को

 इस चुनाव की सबसे बड़ी दिलचस्प बात यह रहेगी की भाजपा- कांग्रेस अंदरखाने पूरी तरह से बिखरी हुई है। भाजपा का एक बड़ा धड़ा अंदरखाने राव इंद्रजीत सिंह को 2029 विधानसभा चुनाव की तरह पटखनी देने के लिए खुद को तैयार कर चुका है। कांग्रेस में भी यही स्थिति है लेकिन भाजपा जितना नुकसान उन्हें इसलिए नही होगा की उनके पास खोने को कुछ नही है और वे सार्वजनिक तौर पर चलते फिरते कांग्रेसी ही कहलाते हैं। भांडोरिया मैदान में रहती तो वह सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस प्रत्याशी निहारिका चौधरी को पहुंचा रही थी। अब यहा असली लड़ाई कुशल चुनावी प्रबंधन पर आकर ठहर गई है। यहा माया अपना काम करेगी। अगर माया ने भी अपने घमंड और मरोड का प्रदर्शन किया तो वह किसी भी प्रत्याशी के लिए घातक साबित हो सकता है जिसका खामियाजा 2024 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भुगत चुकी है।

इस बार भी जनता वोट देकर हार जाएगी, मरोड जीत जाएगी

 इस बार भी चुनाव की सबसे बड़ी खास बात यह रहेगी की जनता वोट देकर भी हार जाएगी। उन्हें वही बर्दास्त करना पड़ेगा जो सालों दर सालों करते आ रहे हैं। भ्रष्टाचार पहले से ज्यादा इसलिए राज करेगा की उसके रंग में रंगे कपड़ों को पहनने वाले ही चुनावी मैदान में नजर आ रहे हैं। जीतने के लिए एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का ड्रामा इसलिए कर रहे हैं की उन्हें पता है की कीचड़ और भ्रष्टाचार दोनों का रंग एक जैसा है। इसलिए कोई दाग नजर नही आने की वजह से कोई उन्हें पहचान नही पाएगा की असली भ्रष्टाचारी कौन है। इस जंग में दोनों तरफ से  अंदरखाने कदम कदम पर प्रतिघात होगा, छल- कपट होगा लेकिन आपस में भरोसा नही होगा। यह चुनाव सबसे ज्यादा फायदेमंद दोनों राजनीतिक दलों के उन पदाधिकारियों, चाटुकारों व बाजारू कार्यकर्ताओं के लिए रामबाण की तरह होगा जिसके पास खोने को कुछ नही है और उनकी अपनी जमीन पर कोई हैसियत नही है। बस आला कमान को खुश करने की महारत जरूर उनके पास जरूर होती है।  इसलिए बेहद ही चालाकी से ये दोनों हाथों में लडडू लेकर चल रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए राजनीति का मतलब ही मनी एंड मसल पॉवर है।

यह चुनाव उनके लिए चुनौती जो जवाबदेही से बंधे हुए हैं

सही मायनों में चुनाव में इस तरह के समीकरण उन नेताओं के लिए यह चुनाव चुनौती बन जाते है जो पूरी तरह से जिम्मेदारी व जवाबदेही में बंधे हुए होते हैं। वे चाहकर भी अपनी मन की बात सार्वजनिक तौर पर नही कह सकते।