-भाजपा के चेहरे पर राम का भाव, अंदर गुटबाजी का रावण कर रहा तांडव
-कायदे से अब राव को तय करना है की असली इंद्रजीत भाजपा में रह रहा है या रामपुरा हाउस में। इतना जरूर है की अभी तक अपने मिजाज की राजनीति करता आ रहा यह नेता भाजपा में आने के बाद अपने असल वजूद को बचाए रखने के लिए पार्टी के अंदर ही चौतरफा लड़ रहा है।
रणघोष खास. सुभाष चौधरी
हरियाणा के नगर निकायों के चुनाव में भाजपा बाहर से जितनी शांत नजर आ रही है अंदर से पूरी तरह से अशांत है। अंदर- बाहर एक दूसरे के खिलाफ बहुत कुछ चल रहा है। जिसका असर भाजपा उम्मीदवार की हार जीत पर पड़ना तय है। कहने को भाजपा कार्यकर्ताओं के चेहरे पर राम जैसी भावना,पहनावा, बोलचाल और पार्टी कार्यालयों में नजर आ रही कार्यशैली हिंदुत्व के स्वरूप को प्रदर्शित कर रही है लेकिन उनके शरीर के भीतर अलग अलग वजहों से फैलती गुटबाजी- धड़ेबाजी का रावण तांडव करता नजर आ रहा है। नगर परिषद रेवाड़ी व धारूहेड़ा से इसकी शुरूआत करते हैं। यहां पर केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बदौलत रेवाड़ी से विनिता पीपल चेयरपर्सन व नगर पालिका धारूहेड़ा से अजय जांगडा चेयरमैन पद के लिए भाजपा की उम्मीदवार है। राव के पास अपने कार्यकर्ताओं की अलग से फौज है तो भाजपा संगठन के तौर पर सेना भी बराबर खड़ी है। इस सीट पर पार्टी भीतरखाने पूरी तरह से बिखरी हुई हैं। एक बहुत बड़ा धड़ा विरोधी के तौर पर उनके साथ नही है। वह औपचारिकता की रस्म निभाकर खामोशी से वक्त गुजार रहा है। राव भी उनके साथ कभी नही रहे। यहा हिसाब बराबर है। यह सीट भाजपा शुरूआती चरण में बेहद सुरक्षित मानकर चल रही थी लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है। राव के समर्थक लगातार बेशक यहा से जीत दर्ज करते आ रहे लेकिन यह भी सच है की उनकी निजी राजनीति का दायरा पिछले 12 सालों में सिकुडता चला गया। थोड़ा पीछे जाइए। जब राव कांग्रेस के मैदान में नजर आते थे जनता उन्हें रामपुरा हाउस के नाम पर वोट देती थी। कांग्रेस नाम तो महज सिंबल के तौर पर चलता था। उन्हें कांग्रेस सरकार में गांधी परिवार या पीएम रहे डॉ.मनमोहन सिंह के नाम पर वोट नहीं मिलते थे। 2013 में भाजपा ज्वाइन करने के बाद से आज तक राव यह हिम्मत नहीं जुटा पाए की जनता उन्हें रामपुरा हाउस के नाम पर ताकत दे। वे मोदी के नाम से ही अपनी नैया पार लगाते आ रहे हैँ। चुनाव में उनके भाषण की शुरूआत भी भाजपा से शुरू होकर अब भाजपा पर ही खत्म होती है। गौर करिए 1952 से 2014 तक 62 साल की लंबी सफल राजनीति पारी रामपुरा हाउस अपने दम पर खेलता आ रहा है। राजनीतिक दल इस हाउस से अनुमति लेकर ही अपनी जमीन तैयार करते थे। पिछले 12 सालों में सबकुछ बदलता चला गया। इसी रामपुरा हाउस की हैसियत देश की सत्ता में एक राज्य मंत्री बने रहने के अलावा किसी लायक नही रही। जबकि भाजपा में ऐसे नेताओं की भरमार है जिसका कद राव की राजनीति के आस पास भी नही ठहरता लेकिन वे पद में राव से बड़े ओहदे पर बैठे हुए हैं। ऐसे में यह उम्मीद करना की समय समय पर होने वाले छोटे बड़े चुनाव में रामपुरा हाउस अपने पुराने वजूद में लौट आएगा। बहुत मुश्किल है। यह तो राव को तय करना है की असली इंद्रजीत भाजपा में रह रहा है या रामपुरा हाउस में। इतना जरूर है की अभी तक अपने मिजाज की राजनीति करता आ रहा यह नेता भाजपा में आने के बाद अपने असल वजूद को कायम करने और उसे बचाए रखने के लिए बाहर से ज्यादा पार्टी के अंदर ज्यादा संघर्ष करता हुआ ही नजर आएगा।