हरियाणा विधानसभा चुनाव में इस हकीकत से मुलाकात जरूरी है..

हर सीट की अपनी अलग कहानी है.. रजल्ट से पहले जो दिखाया, बताया जा रहा वह बाजार है..


रणघोष खास. प्रदीप हरीश नारायण

 हरियाणा विधानसभा चुनाव में मतदान के बाद प्रत्याशियों की हार जीत को लेकर रजल्ट से पहले जो माहौल बनाया जा रहा है वह पूरी तरह से हवा में तीर की तरह है। एग्जिट पोल का अपना बाजार है। पत्रकार के नाम पर गली मोहल्लों में खुली दुकानों का अपना सीजन है। दिल्ली- चंडीगढ़ जैसे महानगरों में ब्यूटी पार्लर की तरह खुले मीडिया हाउस में मेकअप करके बैठे पत्रकारों और एक्सपर्ट का ज्ञान इतना भंयकर है की जिसे सुनकर मां सरस्वती भी डर के मारे किसी कोने में छुप जाती है। इसलिए रजल्ट नही आने तक सारे प्रत्याशी जीत रहे होते हैं और सारे के सारे हार भी रहे होते हैं। ऐसा लगेगा मतदाता वोट डालने से पहले मीडिया वाले ओर प्रत्याशियों से अनुमति ले रहा है साहब उस उम्मीदवार को वोट देनी है या नही..।

 इस चुनाव में हकीकत यह है सभी 90 विधानसभा सीटों की अपनी हार जीत की अलग अलग कहानी है। जिसे एक अनुमान के आधार पर पारिभाषित करना लोकतंत्र प्रणाली व्यवस्था का मजाक उड़ाने के अलावा कुछ नही है। इसलिए गौर करिए हर चुनाव में एग्जिट पोल की पोल सामने आ जाती है। तमाम दावें फेल हो जाते हैं। ऐसा करने वालों को असर इसलिए नही पड़ता क्योंकि यह उनका पेशा है। किसी सीट पर उम्मीदवार का चेहरा, व्यवहार देखा जा रहा है तो कहीं धर्म ओर जातिगत समीकरण अपना काम कर रहे हैं। कही राजनीतिक दलों के मुद्दे अपना काम कर रहे हैं तो कही प्रत्याशी के बोलने का अंदाज से लोग प्रभावित हो रहे हैं।  कही पानी की तरह बहाए जा रहे पैसो की वजह से वोटों का ईमान बिक रहा है तो कहीं पकड़े जाने से हो रहे नुकसान से हार जीत अपना मिजाज बदल रही है। कही किसी उम्मीदवार की जुबान से निकला अमर्यादित शब्द उसके लिए घातक बन रहा है तो किसी का व्यक्तित्व लोगों को भा रहा है। कोई मै के अहंकार में वोट मांग रहा है तो कोई झुककर मै को हम बनाकर चुपके से लोगों के दिलों में जगह बना रहा है। किसी को सहानुभूति से ताकत मिल रही  है तो कोई इस भ्रम में है की बाहर से कोई स्टार प्रचारक आएंगे ओर उसे जीताकर चले जाएंगे। कोई पैकेज से मीडिया से अपने पक्ष में माहौल बनाकर जीतना चाहता है तो कोई डोर टू डोर जाकर यह बता रहा है की उसे एक बार मौका तो दीजिए..। कोई खुद को प्रभावशाली दिखाकर अपना असर दिखाना चाहता है तो कोई खुद को बेहद साधारण बताकर गले मिलकर अपना बनाने में लगा हुआ है। इसलिए हर सीट की अपनी हार जीत की कहानी है। इसके अलावा जो कुछ भी कहानी बताई जा रही है, माहौल बनाया जा रहा है समझ जाइए आप पूरी तरह से ऐसे बाजार में खड़े हैं जिसमें आपकी भावनाओं, संवेदनाओं ओर विश्वास को शातिर अंदाज में कब बेच दिया जाता है अहसास तक नही होता। इसलिए बहकिए मत, धैर्य रखिए और 8 अक्टूबर तक आने वाले परिणामों से पहले बनने वाली किसी भी धारणा को अपनी समझदारी से खत्म कर डालिए। यह चुनाव उत्सव है एक दूसरे को नीचा दिखाने की बजाए गले मिलिए। दीवाली आ रही है..।