रणघोष खास. प्रदीप हरीश नारायण
हरियाणा विधानसभा चुनाव में ईमानदार कौन रहा। इसका सही जवाब पाना उसी तरह है जिस तरह हनुमान जी हिमालय पर्वत में संजीवनी बुटटी तलाशते रहे ओर परेशान होकर पर्वत ही उठाकर ले आए। क्या हम उम्मीदवार को ईमानदार माने जिसने सबूत के तौर पर नामाकंन पत्र जमा करवाया हुआ है। जिसमें उसने बड़ी जिम्मेदारी के साथ खुद के बारे में सबकुछ बताया हुआ है। मतदाता को ईमानदार माने जो चुनाव से पहले भारतीय नागरिक कहलाता है चुनाव में वह जाति धर्म के नाम पर ऐसे बंट जाता है मानो इसके बिना उसका कोई वजूद ही नही था। क्या मीडिया को ईमानदार माने जिसने बिना पैकेज लिए कोई खबर दिखाई हो। आखिर असल में ईमानदार कौन है। जिस पर भरोसा किया जाए सके। मीडिया होने के नाते हम अपने बारे में तो कह सकते हैं की हम पूरी तरह से ईमानदार नही है। वजह भी जान लिजिए। जैसे ही चुनाव की घोषणा होती है। आचार संहिता के नाम पर मीडिया भी अपने तौर तरीके बदल लेता है। मीडिया में भी कई तरह की प्रजातिया चुनाव में पनप जाती है। एक घूमंतू, एक लिखंतू ओर ऐसी भी है जो ना घूमंत ना लिखंतू फिर भी सबसे ज्यादा चुनाव में छाई रहती है वह है सोशल मीडिया प्रजाति। सभी का परिचय अंदाज एक जैसा है। मै फलां मीडिया से.. मै फलां चैनल से.. मेरे पास पांच से दस मीडिया चैनलों का टेडर है.. मेरी लिखी खबर दस अखबारों में छपती है..। ऐसा लगेगा पत्रकार नही होकर दिल्ली- चंडीगढ़ से बड़ी दुकान चलाने वालों ने चुनाव में थोक के भाव अपनी फ्रेंचाइजी बांट दी हो। नतीजा उम्मीदवारों का मीडिया संभालने वाले इस जमात को चाय के बहाने बुलाते हैं। एक एक करके हैसियत के हिसाब से उनकी बोली लगाते हैं। इस तरह पूरे चुनाव में इस सांस्कृतिक मीडिया का अलग अलग रंग जमा रहता है। हालात यह हो चुकी है की किसे देखे या किसे अनदेखा करे। ज्यादा खुश हुए तो मतदान से पहले रजल्ट सुना देते हैं। जिसने पैकेज नही दिया वह चुनावी मुकाबले में ही नही है। जिसने सबसे पैकेज ज्यादा दिया वह जीत के बेहद करीब नजर आएगा। कुल मिलाकर हमने तो चुनाव में ईमानदारी नही दिखाई, क्या आपने दिखाई क्या.. ?