रणघोष खास. रामपुरा से
रेवाड़ी में रामपुरा गांव का नाम है लेकिन पहचान केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह परिवार के नाम से देश प्रदेश में अपनी अलग ही हैसियत रखती है। इस रामपुरा हाउस को लंबे समय से समझते, जानते और इसकी जड़ों से निकलने वाली आवाज को पहचाने वालों की नजर में अब यह हाउस पहले वाला नही रहा। पिछले कुछ सालों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तोर पर इसमें कार्यकर्ताओं के नाम पर ऐसी जमात अपनी जड़े जमाती जा रही है जिसका रास्ता खेत खलिहान, गांव की चौपाल से ना होकर ऐसे बाजार से आ रहा है जहां राव इंद्रजीत सिंह की प्रतिष्ठा, गरिमा ओर स्वाभिमान को यह जमात एटीएम की तरह चालाकी से अपने लिए इस्तेमाल करती है। ऐसे बाजारू कार्यकर्ता धन ओर बल का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। राजनीति में इसकी जरूरत होती है इस बात से इंकार नही किया जा सकता लेकिन वह सीधे सपाट रास्ते से भी आ सकती है। राव इंद्रजीत सिंह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसलिए अपना मित्र नही कहते, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह उनकी राजनीतिक ताकत को ऐसे सार्वजनिक तोर पर स्वीकार नही करते, केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह राष्ट्रीय पटल पर राव की इतनी बड़ी राजनीतिक पारी को बेदाग बताकर इसलिए खुश नही होते। इस नेता ने यह साबित किया है इसलिए वे 50 साल से सफल राजनीति करते आ रहे हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में वे लगातार पांचवी बार सांसद बनकर हरियाणा के पहले नेता ऐसे नही बन गए। इस बार के विधानसभा चुनाव में पहली बार हाईकमान ने खुले मन से उन्हें अपने हिसाब से टिकट पर अपनी मोहर लगाने की अनुमति दी। इतना सबकुछ होने के बावजूद एक असल सच यह भी है कि रामुपरा हाउस अब पहले वाला नही रहा। यहा लंबे समय तक बिना स्वार्थ के जुड़े उनके समर्थकों की माने तो इस बार के लोकसभा चुनाव में राव को इतने कम वोटों से जीत नही मिलती अगर वे अपने आस पास चाटुकारिता की चासनी में डूबे कार्यकर्ताओं ओर बाजारू सोच रखने वालों पर आंख मूंद कर भरोसा नही करते। एक मोटे अनुमान के अनुसार 50 प्रतिशत समर्पित कार्यकर्ता मौजूदा हालात को देखकर पूरी तरह से खामोश है या फिर चुपचाप खुद को एक दायरे में सिमेट चुकेहैं। यही वजह है की राव को एक साथ अनेक मोर्चे पर लड़ना पड़ रहा है। उनकी बेटी आरती राव इस स्थिति को बखूबी समझ चुकी है। वह कई बार मीटिंग में आागाह भी कर चुकी है की वे महज चेहरा दिखाने के लिए उनके आस पास नही मंडराए। कुल मिलाकर इस चुनाव में राव को चुनौती विरोधियों से ज्यादा रामपुरा हाउस में फैल चुके इन बाजारू कार्यकर्ताओं की तरफ से बनाए माहौल से ज्यादा मिलेगी। लोकसभा चुनाव में इसका आभास हो चुका है।