सीधी सपाट बात : 2024 वाले सतीश यादव में कितना दम है, यह आज उनके समर्थक बता देंगे

रणघोष खास. रेवाड़ी से ग्रांउड रिपोर्ट

रेवाड़ी विधानसभा सीट पर भाजपा- कांग्रेस प्रत्याशी उम्मीदवारों का एलान होने के बाद भी यहा की राजनीति ने अपने पत्ते नही खोले हैं। 8 सितंबर को सुबह 10 बजे पूर्व जिला प्रमुख सतीश यादव ने गणपति गार्डन में समर्थकों की मीटिंग बुलाई है। जिसमें निकलने वाली आवाज इस सीट का हाल चाल तय करेगी।

निर्दलीय उम्मीदवारी के तौर पर सतीश यादव का तजुर्बा भाजपा प्रत्याशी लक्ष्मण यादव  ओर  कांग्रेस उम्मीदवार चिरंजीव राव से ज्यादा मजबूत रहा है। वे इस सीट पर दो बार चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें हारने के बावजूद भी  उनकी जमीनी हैसियत बेहद सम्मानजनक रही है। नगर परिषद चेयरपर्सन चुनाव में उनकी पत्नी उपमा यादव ने भी मुकाबला नही जीता लेकिन दूसरी पोजीशन लेकर यह साबित कर दिया की रेवाड़ी उन्हें ओर वे रेवाड़ी को आधी रात में आवाज देकर बुला सकते हैं। इस बार का यह चुनाव उस थ्रिलर फिल्म की तरह है जिसके अंत में जाकर पता चलेगा की हार जीत में असली खलनायक ओर महानायक कौन था। किसने सामने आकर ओर किसने पर्दे के पीछे इस चुनावी खेल को बदला। कौन डबल रोल में रहा। इस चुनाव में वह सबकुछ होगा जो एक सस्पेंस फिल्म के हर सीन में नजर आता है। ऐसा पहली हो रहा है जब चंडीगढ़ या दिल्ली से चलकर आने वाली किसी भी राजनीतिक दल की कोई हवा विधानसभा की दहलीज पर आकर खत्म हो जाती है। यहां उम्मीदवार की अपनी हैसियत, व्यवहार और सोशल इमेज ही उसकी मजबूत दावेदारी का आधार बनेगा। इस मामले में 2024 वाले सतीश यादव ने काफी प्रोग्रेस की है जो कही ना कही इस सीट को पूरी तरह से त्रिकोणीय बनाएगी। रेवाड़ी शहर के जो हालात है उसके लिए वे तमाम  छोटे बड़े जनप्रतिनिधि पूरी तरह से जिम्मेदार है जिन्होंने यहां की सत्ता पर लंबे समय तक राज किया है। 2019 से 2024 तक इस सीट पर कांग्रेस विधायक चिंरजीव राव रहे लेकिन सरकार की कमान भाजपा के पास थी। ऐसा भी नही है की अपना विधायक नही होने से सरकार ने इस क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार किया हो। उलटा राजनीति दृष्टि से विश्वास को मजबूत करने के लिए ज्यादा प्रयास हुए लेकिन उसकी सही तस्वीर ना तो यहा के भाजपा नेता पेश कर पाए ओर ना ही यहां के विधायक इसे पूरी तरह सरकार के खिलाफ पूरी तरह से माहौल बना पाए।  इस स्थिति में सतीश यादव के पास कहने ओर सुनाने का बेहतर अवसर इस चुनाव में साफ तौर से नजर आ रहा है लेकिन उसे वोटों में तब्दील कर पाना किसी सूरत में आसान नही है। यहा के मतदाताओं का मिजाज कभी खुलकर सड़कों पर नही आता। उनकी खामोशी में असली हार जीत का गणित छिपा रहता है। जिसे निर्दलीय के तोर पर ना यहां के धाकड़ नेता रणधीर सिंह कापड़ीवास भी पूरी तरह से समझ नही पाए हैं और यही चुनौती सतीश यादव के लिए रहेगी।