पहले पद्मश्री, अब PM मोदी का दौरा; डेरा सचखंड बल्लां क्यों बना सियासी अखाड़ा? समझिए पूरा खेल

PM Modi Visit Dera Sachkhand Ballan: पंजाब की राजनीति में क्यों अहम है डेरा बल्लां? | रविदास जयंती Special

PM मोदी का डेरा सचखंड बल्लां दौरा, पद्मश्री सम्मान और पंजाब चुनाव—डेरा बल्लां कैसे बना राजनीति का केंद्र? पूरी रिपोर्ट पढ़ें।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 1 फरवरी को पंजाब के जालंधर जिले के पास स्थित डेरा सचखंड बल्लां का प्रस्तावित दौरा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आने वाले समय में पंजाब की राजनीति की दिशा तय करने वाला बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। रविदास जयंती के अवसर पर होने वाली यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब राज्य में करीब एक साल बाद विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और सभी राजनीतिक दल दलित वोट बैंक को साधने में जुटे हुए हैं।

इस दौरे से ठीक पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर डेरा प्रमुख संत निरंजन दास को पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक राजनीतिक और प्रतीकात्मक बना दिया है। यही वजह है कि डेरा सचखंड बल्लां एक बार फिर सियासी अखाड़े के रूप में चर्चा के केंद्र में आ गया है।

PM मोदी का दौरा और केंद्र सरकार का संदेश

केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में बजट सत्र में शामिल होने के बाद रविवार दोपहर डेरा बल्लां पहुंचेंगे। बिट्टू ने इसे पंजाब के सभी समुदायों के लिए गर्व का क्षण बताया और विपक्ष से इस दौरे का राजनीतिकरण न करने की अपील भी की।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी साल में प्रधानमंत्री का किसी प्रभावशाली धार्मिक-सामाजिक केंद्र का दौरा अपने आप में एक मजबूत राजनीतिक संदेश देता है। खासकर तब, जब वह केंद्र दलित समुदाय से गहराई से जुड़ा हो।

डेरा सचखंड बल्लां क्यों है इतना प्रभावशाली?

डेरा सचखंड बल्लां पंजाब के दोआबा क्षेत्र में स्थित है और रविदासिया समुदाय का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र माना जाता है। पंजाब में दलित आबादी लगभग 32 प्रतिशत है, जो देश में किसी भी राज्य से अधिक है। इनमें से करीब 45 प्रतिशत दलित आबादी दोआबा क्षेत्र में रहती है।

राजनीतिक दृष्टि से दोआबा बेहद अहम है क्योंकि यहां से पंजाब विधानसभा की 117 में से 23 सीटें आती हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक अध्ययनों के अनुसार डेरा बल्लां का प्रभाव कम से कम 19 विधानसभा सीटों पर माना जाता है। यही कारण है कि लगभग हर बड़ा राजनीतिक दल और नेता समय-समय पर डेरा प्रमुख के दरबार में हाजिरी लगाता रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक रॉन्की राम के शब्दों में, “डेरों की सामाजिक भूमिका के कारण दलित समुदाय में उनका गहरा प्रभाव है और चुनावी राजनीति में इन्हें नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए नुकसानदेह हो सकता है।”

चुनावों में डेरा बल्लां की निर्णायक भूमिका

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में डेरा बल्लां का प्रभाव साफ नजर आया था। आम आदमी पार्टी की जबरदस्त लहर के बावजूद कांग्रेस दोआबा क्षेत्र में मजबूती से टिकी रही। 23 सीटों में से AAP और कांग्रेस ने 10-10 सीटें जीतीं, जबकि शिरोमणि अकाली दल, बहुजन समाज पार्टी और भाजपा को एक-एक सीट मिली।

2017 के चुनावों में कांग्रेस ने दोआबा में लगभग क्लीन स्वीप किया था। इसी वजह से अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान, चरणजीत सिंह चन्नी, अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, प्रताप सिंह बाजवा और सुखबीर सिंह बादल जैसे तमाम दिग्गज नेता डेरा बल्लां पहुंचते रहे हैं।

पद्मश्री सम्मान और भाजपा की रणनीति

पंजाब भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष अश्वनी शर्मा ने संत निरंजन दास को पद्मश्री दिए जाने को गुरु रविदास महाराज के विचारों को देश-विदेश तक पहुंचाने के योगदान का सम्मान बताया है। भाजपा इसे केंद्र सरकार की उस नीति के रूप में पेश कर रही है, जिसमें हर वर्ग, समुदाय और क्षेत्र के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी जाती है।

राजनीतिक रूप से देखें तो यह कदम दलित समुदाय के बीच भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, खासकर उस राज्य में जहां भाजपा लंबे समय से सीमित प्रभाव में रही है।

2009 की घटना और बदला हुआ इतिहास

डेरा सचखंड बल्लां 2009 में उस समय सुर्खियों में आया था, जब ऑस्ट्रिया के वियना में संत रामानंद की हत्या कर दी गई थी। इस घटना में वर्तमान डेरा प्रमुख संत निरंजन दास भी घायल हुए थे। इस हमले के बाद पंजाब में दलित-सिख तनाव की स्थिति बनी और रविदासिया समुदाय ने अपनी अलग धार्मिक पहचान को और मजबूती से सामने रखा।

2010 में संत निरंजन दास ने वाराणसी स्थित गुरु रविदास जन्मस्थली से रविदासिया धर्म की औपचारिक घोषणा की और ‘अमृत बाणी: सतगुरु रविदास ग्रंथ’ को पवित्र ग्रंथ के रूप में अपनाया। इसे समुदाय के इतिहास में एक बड़ा मोड़ माना जाता है, हालांकि इसके चलते डेरा के भीतर मतभेद भी सामने आए और एक अलग धड़ा भी बना।

धर्म, समाज और राजनीति का संगम

आज डेरा सचखंड बल्लां केवल एक धार्मिक स्थल नहीं रह गया है। यह दलित सामाजिक सशक्तिकरण, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक प्रभाव का मजबूत केंद्र बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रस्तावित दौरा यह संकेत देता है कि आने वाले समय में पंजाब की राजनीति में डेरा बल्लां की भूमिका और अधिक निर्णायक होने वाली है।

रविदास जयंती, पद्मश्री सम्मान और चुनावी माहौल—इन तीनों के संगम ने डेरा सचखंड बल्लां को एक बार फिर पंजाब की सियासत के केंद्र में ला खड़ा किया है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस दौरे का राजनीतिक असर किस दिशा में जाता है।