रणघोष खास. सुभाष चौधरी
छोटे बड़े चुनाव में मीडिया के चाल चरित्र को लेकर हर कोई जमकर हमला करता है। ऐसा करते समय भूल जाते हैं की मीडिया व्यवसायिक क्षेत्र से ही जन्मा है। इसमें प्रोफेशनल टीम काम करती है जैसे अन्य व्यवसायों में होता है। मीडिया में काम करने वाले इंसान ही होते हैं। उनका भी अपना पारिवारिक और सामाजिक जीवन होता है। जो दायित्य समाज में प्रत्येक व्यक्ति का होता है वही जिम्मेदारी मीडिया की भी होती है। सफाई कर्मचारी अपनी डयूटी ईमानदारी से नही निभाए तो गंदगी के ढेर लग जाते हैं। जिले का डीसी बेपरवाह हो जाए तो हालात बेकाबू हो जाते हैं। समाज में तमाम लोग किसी ना किसी जिम्मेदारियों से बंधे हुए हैं। इसमें नौकरी, व्यवसाय की शक्ल में अर्थ सभी के जीवन में शरीर में खून की तरह काम करता है। सवाल यह है की यह अर्थ नैतिकता- मूल्य के रास्ते से आ रहा है या एकदम इससे उलट रास्ते से। यही सबकुछ मीडिया में लागू होता है। चुनाव में मीडिया पैकेज के नाम पर राशि हैसियत के हिसाब से तय होती है इसमें प्रोफेशनल स्तर पर सार्वजनिक रजामंदी होनी चाहिए ताकि उम्मीदवार ओर मीडिया आगे चलकर एक दूसरे की आंखों में आंख डालकर एक दूसरे बात कर सके। लेकिन चुनावों में ऐसा नही करके इसे चौराहे पर अपनी मजदूरी की बोलती लगाते मजदूरों की तरह ट्रीट किया जाता है। चुनाव में पत्रकारिता के नाम पर कई तरह की प्रजातियां जन्म ले लेती है। चुनाव लड़ने वाला इतना उलझन में रहता है की वह समझ नही पाता की वह किसे सही माने ओर किसे गलत। जिसे अनदेखा किया वह उसे डराना शुरू कर देता है। जिसे सही माना उसके नखरे बर्दास्त करने पड़ेगे। वजह चुनाव लड़ने वाले मीडिया के ढांचे को प्रोफेशनल तरीके से समझने की बजाय सीधा सौदेबाजी पर आ जाते है। यही पर गड़बड़ी शुरू हो जाती है। इन तमाम वजहों से बनी स्थिति के कारण मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ एवं आमजन की आवाज के नाम पर चुनाव में हाथ में कटोरा लिए घूमता हुआ नजर आता है।