पांच साल तक जो पूनम यादव भाजपा चेयरपर्सन रही, चुनाव में बाहर कर दिया, क्या यही भाजपा का रिपोर्ट कार्ड है..
— भाजपा अब चाहकर भी कांग्रेस पर हमला नही कर सकती, सत्ता के 14 साल कम नही होते..
रणघोष खास. सुभाष चौधरी
नगर निकाय चुनाव को लोकतंत्र प्रणाली में सबसे छोटी सीट का चुनाव माना जाता है जैसे गांवों में ग्राम पंचायत का चुनाव। इसे दूसरी भाषा में किसी भी राजनीतिक दल की बुनियाद भी कहा जा सकता है।इन दिनों हरियाणा के कुछ जिलों में नगर निकाय चुनाव होने जा रहे हैं जो सीधे तौर पर सत्ताधारी पार्टी ओर उससे जुड़े प्रभावशाली नेताओं के रिपोर्ट कार्ड का काम करेंगे। रेवाड़ी नगर परिषद और नगर पालिक धारूहेड़ा चुनाव के जरिए मौजूदा राजनीति को आसानी से समझा जा सकता है जिसमें भाजपा के अलावा किसी भी दल की कोई प्रतिष्ठा दांव पर इसलिए नही लगी हुई है की उनके पास खोने को कुछ बचा ही नही है। इसके बावजूद भाजपा ही इन दोनों सीटों पर सबसे ज्यादा बैचेन नजर आ रही है। स्थिति स्वत: ऐसे बनती जा रही है की दिग्गज नेताओं से लेकर स्थानीय नेताओं, विधायक, पदाधिकारी और अच्छी खासी कार्यकर्ताओं की फौज को सुबह शाम गली मोहल्लों में बार बार मतदाताओं के घरों की घंटी बजाने के लिए कहा जा रहा है। उधर कांग्रेस व निर्दलीय उम्मीदवार खुद में ही संगठन और छोटे बड़े नेता बनकर अपने अंदाज में जनसंपर्क किए हुए हैं। जाहिर है कही ना कही भाजपाईयों को यह आभास हो गया है की जिस जीत को वे एकतरफा मानकर चल रहे थे वह पार्टी के भीतर चल रहे घमासान के चलते नींद उड़ाने वाली होने जा रही है। आइए इसे सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
पिछले 12 सालों में हरियाणा में भाजपा सरकार है। नगर निकायों के सभी बड़े ओहदों पर पर भी उनका कब्जा रहा है। शहर में विकास कराने के लिए 10 से 12 साल का समय कम नही होता है। अगर सचमुच में विकास हुआ है तो इन छोटे चुनाव में मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र व राज्य के शीर्ष नेताओं को क्यों पसीना बहाना पड़ रहा है। कमाल की बात देखिए रेवाड़ी नगर परिषद में जिस पूनम यादव ने बतौर भाजपा चेयरपर्सन पांच साल राज किया। शुक्रवार को भाजपा ने ही एक मई को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते छह साल के लिए निष्काषित कर दिया। यही कार्रवाई धारूहेड़ा चेयरमैन रहे कंवर सिंह पर की गई है। क्या ऐसा करने से पिछले पांच सालों में जिसने रेवाड़ी को हर लिहाज से पीछे धकेल दिया। उसकी नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा। इस चुनाव में पहली बार विपक्ष की तरकश में हमला करने के लिए तीरों की भरमार नजर आ रही है लेकिन बहुत से तीर वापस ही कुछ उम्मीदवारों पर ही लग रहे हैं। इसलिए इस चुनाव में कोई उम्मीदवार यह दावा करें की उसने पार्षद, चेयरमैन रहते हुए ईमानदारी से काम किया है समझ जाइए वह सबसे ज्यादा खतरनाक है। इस चुनाव में अब भाजपा कांग्रेस पर चाहकर भी हमला नही कर सकती। विधानसभा सीट पर 2014 से पहले तक कांग्रेस का लंबे तक कप्तान अजय सिंह यादव का इसी सीट पर राज रहा। 2014 से 2019 तक भाजपा से रणधीर सिंह कापड़ीवास विधायक रहे। उसके बाद 2019 से 2024 तक कांग्रेस से चिरंजीव राव विधायक बने। वर्तमान में भाजपा से लक्ष्मण सिंह यादव ने मोर्चा संभाला हुआ है। लेकिन नगर परिषद जिसे शहर की सरकार कहा जाता है जिसका अपना बजट और अपनी स्वतंत्रता होती है। उस पर पिछले 10 सालों से भाजपा का राज रहा है जिसमें करीब डेढ़ साल विनिता पीपल जो वर्तमान में भाजपा की तरफ से चेयरपर्सन की उम्मीदवार भी है। उसके बाद पांच साल तक पूनम यादव चेयरपर्सन रही जिसमें इस चुनाव में भाजपा संगठन ने छह साल के निष्काषित कर दिया है। विनिता पीपल और पूनम यादव के सिर पर केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह का आशीर्वाद रहा है। इसलिए टिकट दिलाने में इस बार भी राव का फरमान चला है। चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के अलावा कांग्रेस की तरफ से निहारिका चौधरी व निर्दलीय के तौर पर पूर्व चेयरमैन शकुंतला भांडोरिया, डॉ. मीनू डहीनवाल, आशा कुमारी, दीपिका पंवार पूरी तरह से मैदान में उतर चुके हैं। कुल मिलाकर इस चुनाव में भाजपा का नुकसान उबले हुए दूध का बर्तन से बाहर निकलकर जमीन पर बह जाना है जबकि कांग्रेस का दूध का फटना जितना है। फटे हुए दूध का उपयोग हो सकता है लेकिन जमीन पर बिखरा हुआ दूध किसी लायक नही रहता। जहां तक निर्दलीय उम्मीदवारों का सवाल है। उन्होंने उबाल सही ले लिया तो उसे संभालने वाले बहुत आ जाएंगे क्योंकि वे पहले से ही दूध का जले हैं जो छाछ भी फूँक-फूँक कर पीते आ रहे हैँ।