ये टी-20 वाले नेता क्या सोचकर मैदान में उतरे, बिना खेले वापस लौट आए
रणघोष खास. सुभाष चौधरी
विधानसभा चुनाव में एक खेल बड़े दिलचस्प तरीके से खेला जाता है । वह है पहले टिकट नही मिलने पर नाराज होकर निर्दलीय चुनाव लड़ना। जनता के बीच जाकर बड़ी बड़ी बातें करना, सहानुभूति बटोरना। इसके बाद नामाकंन वापसी के अंतिम दिन रूठने मनाने के ड्रामे के बीच नामाकंन वापस लेकर घर बैठ जाना। पता नही क्या सोचकर ये टी-20 वाले ये नेता चुनाव में उतरते हैं। क्या सोचकर जनता के बीच में तरह तरह का ड्रामा करते रहे ओर अंत में नाटक को खत्म करते हुए अपना नामाकंन वापस लेकर अपने पुराने काम धंधे पर लौट आए। इस पूरे घटनाक्रम में कोई मजाक बना है वह है क्षेत्र की जनता। चुनाव के नाम पर नाटक करने वाले इन शार्ट टर्म नेताओं का अपना छिपा एजेंडा होता है जो अलग अलग वजहों से गुप्त मीटिंग में पूरा हो जाता है।
कुछ सीटों पर पहले से ही चुनाव लड़ने ओर नही लड़ने का सुनियोजित खेल शुरू हो जाता है। जहां भाजपा से खफा होकर कोई चुनाव लड़ता है वहां कांग्रेस उम्मीदवार उसे अंतिम समय तक चुनाव लड़ाने में पूरी मदद करता है। यहा तक की अंदरखाने चुनावी पैकेज तक फाइनल हो जाता है। अगर उससे ज्यादा का पैकेज भाजपा उम्मीदवार से मिल जाता है तो वह मैदान छोड़ देता है। इस तरह चुनाव में आधे से ज्यादा प्रत्याशी इसे अच्छा खासा कारोबार समझकर अपना खेल कर जाते हैं ओर जनता हर बार की तरह खुद को छला ओर ठगा हुआ महसूस करती है। कुछ ऐसे भी होते हैं जो इस त्याग के नाम पर सरकार बनने में किसी पद की डील कर लेते हैं। बहुत से टिकट नही मिलने पर चुनाव तो नही लड़ते लेकिन अपनी नाराजगी की कीमत जरूर तय करा लेते हैं। सबकुछ इतनी चालाकी ओर सफाई से किया जाता है की हर पांच साल में हर सीट पर खेल शानदार तरीके से चलता है। सोचिए जिसे समाजसेवा करने के लिए राजनीति में आना है तो उसे टिकट और हार जीत की परवाह नही करनी चाहिए। जनता के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए। इस तरह की सोच रखने वाले ही असली जनप्रतिनिधि होते हैं नही तो इस राजनीति के बाजार में नेता के नाम पर तरह तरह के व्यापारी आएंगे और अपना माल बेचकर गायब हो जाएंगे।