जो परिवारवाद, पतिवाद, मनमानीवाद के खिलाफ लड़ रही है, नाम है शकुंतला भांडोरिया..
रणघोष अपडेट. रेवाड़ी
नगर परिषद रेवाड़ी में चेयरपर्सन पद के लिए महिला एससी आरक्षित सीट पर अलग अलग दलों से प्रत्याशी पूरी तरह मैदान में उतरकर अपनी जीत का आधार मजबूत करने में जुट गए हैं। सभी की तरकश में अलग अलग तीर है। कोई पार्टी के बैनर पर मजबूत नजर आ रहा है तो अधिकांश अपने पति की पहचान में खुद को तलाश रही है। इन चेहरों में एक चेहरा ऐसा भी है जिसके पास ना किसी पार्टी का बैनर है और ना पति की पहचान। वह खुद में अपनी पहचान है। उसके खुद के आगे- पीछे, दाए- बाए, ऊपर- नीचे बस अपना ही नाम है।
इस आजाद उम्मीदवार का नाम है शकुंतला भांडोरिया। जो करीब दस साल पहले नगर परिषद की चेयरपर्सन रह चुकी है। चुनाव लड़ने से पहले तक कांग्रेस पृष्ठभूमि से संबंध रखती थी। पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव के सानिध्य में राजनीति में कदम रखा। बेहद ही साधारण परिवेश से निकलकर खुद में अपनी पहचान बनाईं। जब तक नगर परिषद में रही पति का दूर तक कोई दखल तक नही था। यहा तक की आज भी 90 प्रतिशत लोगों को शकुंतला भांडोरिया के पति का नाम तक नही पता है। विवादों में भी रही तो अपने अंदाज से सामने वाले को अपना मुरीद बनाने का हुनर भी रखती है। घुमा फिराकर बोलने की आदत नही है। सीधी सरल भाषा में अपनी बात कहने की महारत रखती है इसलिए विरोधी उसकी बातों का मजाक भी उड़ाते हैँ तो कटाक्ष करने में भी पीछे नही रहते। इस चुनाव में भांडोरिया अपने जनसंपर्क अभियान में लोगों से ही पूछ रही है की आपको चेयरपर्सन कैसा चाहिए। किसी बड़े नेता की तरफ से थोपे जाने वाला या वह चेहरा जिसकी सोच, उसके हस्ताक्षर व मोहर पर उसके पति या बडे नेता का ही अधिकार रहेगा। पिछले चुनाव कार्यकाल में शहर की जनता नगर परिषद में यह तमाशा देख चुकी है। भांडोरिया के चुनाव की खास बात यह है की उसके सवालों में ताकत है जिसका तोड़ उनके विरोधियो के पास भी नही है। उसका कहना है की जब यह सीट ही महिला आरक्षित है तो चेहरा वही भी होना चाहिए जिसके अपने निर्णयों पर दूसरे का कब्जा नही हो। अगर महिला के नाम पर ही किसी को कठपतुली ही बनाना है तो ऐसे आरक्षण का होना और नही होना बराबर है। यह सरासर सरेआम मतदाताओं की आंखों में धुल झोंकना है। भांडोरिया ने अपने चुनाव प्रचार में यह दाव भी खेल दिया है की वह जीतने के बाद सरकार के साथ खड़ी रहेगी। उसके लिए रेवाड़ी शहर का विकास प्राथमिकता है। इसके लिए उसे किसी के आगे झोली भी फैलानी पड़े वह उसके लिए भी तैयार है। वह सभी उम्मीदवारों से उम्र व अनुभव में सबसे मजबूत है। उसने राजनीति जीवन में वह तमाम दौर देखे हैं इसलिए रेवाड़ी को पूरी तरह से पारिवारवाद, पतिवाद और मनमानीवाद से पूरी तरह से आजाद कराने के लिए इससे बेहतर अवसर नही हो सकता। भांडोरिया को भरोसा है की यह चुनाव एकदम अलग होगा। जनता अपनी समझदारी से किसी भी तरह की बहकावे में आने वाली नही है। कुल मिलाकर इस 52 साल की महिला प्रत्याशी ने बहुत कम समय में चुनाव को हर लिहाज से दिलचस्प बना दिया है जिसमें किसी भी उम्मीदवार की जीत आसान नही लग रही है। देखते है जनता किस मिजाज से शहर की इस सरकार का चुनाव करती है।