रेवाड़ी सीट से यह सवाल भी कुछ कह रहा है..

सुनील मुसेपुर चुनाव में खलनायक, बाकि दिनों में समाजसेवी क्यों नजर आता है..


रणघोष खास. रेवाड़ी की कलम से

हरियाणा की रेवाड़ी विधानसभा सीट पर सुनील मुसेपुर एक ऐसा नाम है। जिसकी सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर किसी से कोई निजी दुश्मनी या बुरा व्यवहार नही है। इसके बावजूद चुनाव के समय यह शख्स अपनों के बीच एवं टिकट के कई दावेदारों की आंखों में खलनायक की तरह नजर आने लगता है। दिलचस्प बात यह है की चुनाव को छोड़कर  बाकी समय सुनील मुसेपुर समाजसेवी, सामाजिक- धार्मिक शख्सियत ओर भाजपा के कार्यक्रमों में अग्रणी पंक्ति में नजर आता है। यहा सवाल उठता है की अगर यह नाम चुनाव के समय गलत चुनाव है तो केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह लगातार दूसरी बार सुनील मुसेपुर की जोरदार पैरवी क्यों कर रहे हैं। अगर मुसेपुर इतना ही खराब है तो 2019 के चुनाव में भाजपा की टिकट पर शानदार 42 हजार  553 लेकर महज 1317 वोटों से कैसे हार गया।

रेवाड़ी की सीट तब तक शांत थी जब तक सुनील मुसेपुर और उनकी पत्नी मंजू यादव का नाम पैनल में नही आया था। जैसे ही राव इंद्रजीत सिंह दमदार तरीके से उनकी पैरवी करते हुए नजर आए।  इस सीट का राजनीति बाजार पूरी तरह से गरमा गया। वे लोग भी उसके विरोध में मैदान में कूद गए जो खुद अपने क्रिया कलापों से खुद विवादों में रहे हैं ओर जिनकी अपनी कोई जमीनी हैसियत नही है।  राव इंद्रजीत सिंह की अपनी राजनीति कार्यशैली रही है। वे चुनाव में अपने उन्ही समर्थकों के सिर पर हाथ रखते हैं जिनकी पहचान उनके सिपाही के तौर पर रही है। चाहे राजनीति में उनका दायरा कम ज्यादा रहा हो। राजनीति में उनसे अलावा अलग पहचान रखने वालों की राव से कभी नही बनी और ना ही वे उस पहचान पर अपनी मोहर लगाना पंसद करते हैं। इसलिए भाजपा में उनके विरोधियों की संख्या बेहिसाब है। राव के भरोसे अपना सबकुछ दांव पर लगाकर राजनीति करने वालों के लिए चुनाव बहुत बड़ा जोखिम होता है। राव के लिए गए फैसलों में ही उनकी राजनीति उम्र छिपी रहती है। राव जिस तरीके से रेवाड़ी सीट पर सुनील मुसेपुर के लिए अडे नजर आए। वह कई मायनों में खास है। पहली वे इस सीट पर राजनीति में अपने दुश्मनों को उभरने का कोई अवसर नही देना चाहते।

राव इंद्रजीत सिंह का यही तौर तरीका 50 साल से कामयाब

राव की राजनीति यात्रा में उनके दुश्मन दूसरी राजनीतिक पार्टी से सामने खड़े उम्मीदवार नही, अपनों के बीच वह चेहरे होते है जो उनके मिजाज से नही चलकर अपने हिसाब से चलते है। राव की फिदरत उन्हें उभरने से पहले पूरी तरह से साफ कर देने की रहती है। ताकि आगे चलकर चुनौती नही बन जाए। हालांकि जो किसी तरह उनकी गिरफ्त से निकल गया वे चाहकर भी उनका कुछ नही बिगाड़ पाए हैं। कांग्रेस के समय में राव दान सिंह ओर नांगल चौधरी सीट पर  भाजपा से डॉ. अभय यादव विशेष तौर से मौजूदा मिशाल है। इसी तरह अटेली से पूर्व डिप्टी स्पीकर संतोष यादव,  रेवाड़ी से पूर्व विधायक रणधीर सिंह कापड़ीवास, पूर्व चेयरमैन अरविंद यादव 2019 में विधानसभा चुनाव के बाद से ही उनके निशाने पर है। इस बार नया नाम बावल से लगातार 10 साल तक कैबिनेट मंत्री रहे डॉ. बनवारीलाल का भी जुड़ गया है। यह लिस्ट हर चुनाव में बढ़ती ही जाती है। यही राव इंद्रजीत सिंह की राजनीति की चलती फिरती हकीकत है। लंबे समय से उनका अपना यही तौर तरीका रहा है। राव के समर्थकों की फौज भी इसी राजनीति कल्चर को अपनाती रही है। यही वजह है की दक्षिण हरियाणा में राव इंद्रजीत सिंह अपने इन्हीं तौर तरीकों की वजह से  पिछले 50 सालों से सफल राजनीति करते आ रहे हैं चाहे सत्ता में कांग्रेस या भाजपा की सरकार रही हो। इसलिए इस चुनाव में भी भाजपा हाईकमान उन्हें चाहकर भी अनदेखा करने की हिमाकत नही कर पा रहा है। देखा जाए तो 2024 का चुनाव राव इंद्रजीत सिंह की अगली राजनीति पारी की असल तस्वीर भी है। उम्र ने अब उनके शरीर को आराम करने के लिए बोलना शुरू कर दिया है ओर उनकी बेटी आरती राव का इस चुनाव में भविष्य तय होने जा रहा है। अब सवाल यह उठता है की अगर भाजपा हाईकमान ने उनके हिसाब से टिकटों का बंटवारा किया तो बिना किसी लहर या बेहतर माहौल के बीच राव कैसे समर्थकों को जीता पाने में कामयाब हो पाएंगे। यह देखने वाली बात होगी।