भारत की सीमाएं होंगी अभेद्य: लद्दाख में बनेगी दुनिया की सबसे ऊंची सुरंग
केंद्र सरकार देश की सीमाओं को हर मौसम में सुरक्षित और सुलभ बनाने के लिए रणनीतिक सुरंगों का बड़ा नेटवर्क तैयार कर रही है। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों तक बनने वाली ये सुरंगें न केवल सैन्य दृष्टि से अहम होंगी, बल्कि दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में वर्षभर सड़क संपर्क भी सुनिश्चित करेंगी।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, छह महत्वपूर्ण सुरंग परियोजनाओं की लंबित डीपीआर को फास्ट ट्रैक पर लाने के निर्देश दिए गए हैं। इन परियोजनाओं में सबसे अहम लद्दाख की शिंकु ला सुरंग है।
15,800 फीट पर बनेगी दुनिया की सबसे ऊंची सुरंग
शिंकु ला सुरंग लगभग 4.1 किलोमीटर लंबी होगी और 15,800 फीट की ऊंचाई पर निर्मित की जाएगी। इसे दुनिया की सबसे ऊंची सुरंग बताया जा रहा है।
यह सुरंग निम्मू-पदम-दारचा मार्ग के जरिए लद्दाख को तीसरा वैकल्पिक ऑल-वेदर कनेक्शन प्रदान करेगी। सामरिक दृष्टि से यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वास्तविक नियंत्रण रेखा से सुरक्षित दूरी पर स्थित है।
सरकार का लक्ष्य इस वर्ष के मध्य तक सुरंग का प्री-कंस्ट्रक्शन कार्य शुरू करने का है।
पूर्वोत्तर में सुरंगें बनेंगी गेम-चेंजर
अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में प्रस्तावित स्मल्दर सुरंग सेना की भारी तोपखाना और मिसाइल प्रणालियों को सुरक्षित तरीके से एलएसी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाएगी। इन परियोजनाओं का रूट तय हो चुका है और 2027 तक कार्य शुरू होने की संभावना है।
मणिपुर की मोरेह-थुइबुल सुरंग को लुक ईस्ट पॉलिसी और एशियन हाईवे परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। यह सुरंग न केवल सैन्य आवाजाही को आसान बनाएगी, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापारिक संपर्क को भी छोटा और तेज करेगी।
इसके अलावा, नेचिपु सुरंग के आगे तवांग सेक्टर में 2-3 अतिरिक्त छोटी सुरंगों की डीपीआर भी तैयार की जा रही है।
महाराष्ट्र और केरल में भी बड़े प्रोजेक्ट
सुरंग निर्माण केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में खमशेत-कासरघाट सुरंग परियोजना पश्चिमी घाट में ट्रैफिक को सुचारू करने के लिए बनाई जा रही है। इससे मुंबई-पुणे और मुंबई-गोवा मार्ग पर घाट वाले कठिन रास्तों को कम किया जाएगा और यात्रा समय घटेगा।
दक्षिण भारत में केरल के वायनाड और मलप्पुरम के बीच नीलगिरी सब-वे सुरंग को इको-सेंसिटिव डिजाइन के साथ विकसित किया जाएगा। इसका उद्देश्य पर्यावरण और हाथियों के गलियारों को सुरक्षित रखते हुए कनेक्टिविटी बढ़ाना है।
जम्मू-कश्मीर में सिंथन टॉप ट्विन सुरंग
अनंतनाग को किश्तवाड़ से जोड़ने वाली 10-12 किलोमीटर लंबी ट्विन सुरंग सिंथन टॉप की डीपीआर अंतिम चरण में है। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण सिंथन टॉप दर्रा बंद हो जाता है, जिससे संपर्क बाधित होता है।
यह सुरंग वर्षभर सुरक्षित और वैकल्पिक संपर्क प्रदान करेगी और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास को नई गति देगी।
रणनीतिक और विकास का संगम
विशेषज्ञों का मानना है कि ये सुरंगें केवल रक्षा मजबूती का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास, पर्यटन, व्यापार और स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी खोलेंगी।
भारत जिस गति से सीमाई बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रहा है, उससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में देश की सामरिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ होगी।