होई जबै द्वै तनहुँ इक
अटूट संकल्प (अध्याय 21)
मैं जैसे ही कमरे में गया, छाती में उछलता मेरा दिल जैसे सहज हो गया। मेरे पैरों की कंपकंपी थम गयी। मेरा डर भी गायब हो गया। जो मैंने देखा वह मुझे किसी घटना का दृश्य नहीं, एक चित्र सा लग रहा था। दरअसल मैं चेतनाशून्य हो गया था। ना कुछ सघन था, ना कुछ तरल। ना कुछ ठोस था, और ना कुछ द्रवित या वायवी। सब चित्रमय था। प्रलय की पेंटिंग सा।
एक दरांती अटकी थी, खाट के पैताने, जैसे किसी मरते हुए हाथ से छूट गयी थी। उसकी नोक पर लगा खून सूख गया था। इसके सिवाय खून की एक बूँद का भी निशान कहीं नहीं था। कुछ भी नहीं हिल रहा था, सब स्थिर था। बावरी की एक बिखरी लट के कुछ बालों के सिवाय। मगर बाल तो मृत होते हैं। उनका हिलना जीवन का संकेत नहीं है।
‘करवट लूं तो लट खुलै..’.उसकी सुरीली आवाज़ अचानक मेरे कानों में गूँजी। पर वह तो मेरे सामने पड़ी थी, कुछ ऐसे जैसे किसी तूफान में दूर से आकर गिरी हो। उसकी पाजेब खुल कर गिर गयी थी। ‘ हिलूं बैजे पाजेब…’.फिर उसकी आवाज़ आई। मैंने इधर उधर देखा। ऐसा तो नहीं, बावरी कहीं और है, और उसका शरीर यहाँ पड़ा है? कहीं वह अपना शरीर छोड़ कर मेरे भीतर तो नहीं समा गयी है। “मैं बी तन को त्याग के जाऊं पिया समाय…।”
उसका घाघरा पिंडलियों तक उठा हुआ था। नहीं ऐसा तो उसे एक पल भी अच्छा नहीं लगेगा। इतनी बेपरवाही तो उसने कभी मेरे अकेले के सामने भी नहीं दिखाई। इससे पहले कि उसे पता चले, मैंने झट से ठीक किया।
रोशनदान से हल्की हल्की चाँदनी उतरने लगी थी। दोनों वक़्त मिल गये थे। शिव के भूत सब दिशाओं में निकल गये होंगे। यह कोई सोने का वक़्त नहीं होता है।
धीरे धीरे वास्तविकता मेरी त्वचा को छूने लगी। एक सिहरन सी मेरे बदन में हुई। बावरी बेहोश पड़ी है। उसका बलात्कार हुआ है।
एक सीधी सच्ची औरत की अदम्य तपस्या का यह घिनौना अंत! होश में आएगी तो क्या बीतेगी उस पर। ना, ना.. इससे अच्छा तो यह कभी होश में नहीं आए। इसके लिए मेरा हाथ पकड़ा था इस बावरी औरत ने?
मैंने तय किया उसकी साँस बंद करके मैं उसकी जान ले लूँगा। होश में आएगी तो कैसे आँख मिलाऊँगा।
उसकी मौत के ख्याल से मैं बिलख बिलख कर रोने लगा। मुझे लगा मैं उसकी आवाज़ अब कभी दोबारा नहीं सुन पाऊँगा। वह मेरे रोने का आख़िरी दिन था। मैं रो कर थक गया तो मैंने उसकी साँस बंद कर देने की मन में ठानी। उसी समय मुझे उसकी आवाज़ फिर सुनाई दी। ” अगन का दरिया पार कर आई पी के देस…. अनछुआ मोती भई… काया बन गयी भेस।” और मुझे लगा, कुछ नहीं हुआ है बावरी को। वह आज भी पवित्र है, उतनी ही पवित्र। बलात्कार मात्र एक शारीरिक आघात है। दानवों ने यदि बलात्कार को अधम अस्त्र बनाया है, तो देवताओं ने इसे मन और आत्मा से जोड़ कर मनुष्य के लिए ग्लानि का मार्ग। मात्र एक प्रहार है बलात्कार। इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं मुझे उस दिन लगा मैं बहुत शक्तिशाली हूँ। दुनिया का कोई अस्त्र मुझे नहीं मार सकता है। कोई तलवार मेरे शरीर के दो भाग कर सकती है, मगर मुझे मार नहीं सकती है। यूँ ही नहीं चुना है बावरी ने मुझे। देवताओं से टक्कर लेने वाली एक नादान औरत की लड़ाई में मुझे भी ब्रह्मा ने एक भूमिका दी है। मैं उसे निभाऊँगा। मुझे वे दोनों दिखाई दिये। ‘उनके शरीर पर, हज़ारों आँखें हैं। सब फूटी हुई। जैसे किसी ने एक एक कर फोड़ा है, दरांती मार मार कर।’ मैंने पैताने में फँसी दरांती को निकाल कर गौर से देखा। उसकी नोक पर लगा रक्त, उन्हीं का रक्त था। बावरी के हाथ से छूटी हुई उस दरांती की मूठ को मैंने हाथ में थामा। मैं युद्ध के लिए तैयार था।
मैंने बावरी की बिखरी लट को ठीक किया। पाजेब फिर से पहनाई। कपड़े ठीक करते हुए, उसकी देह की खरोंचों को देखा। वह युद्ध में आहत होकर मूर्छित हो गयी थी। हारी नहीं थी। मैंने जल के छींटे जब उसे दिए, मुझे लगा, गौरा और ईसर कह रहे हैं। उठो पुत्री! तुम्हारा संकल्प टूटा नहीं है।
क्रमश जारी..
