कोई जीते कोई हारे असर सारा डॉ. बनवारीलाल पर पड़ेगा
-चंद्रपाल चौकन – वीरेंद्र सिंह एडवोकेट कहीं चौंका ना दे
रणघोष खास. बावल मतदाता की कलम से
नगर पालिका बावल चुनाव में 22 जून को जो भी नतीजे आए उसका असर चुनाव लड़ने वाले किसी भी प्रत्याशी पर उतना नहीं पड़ेगा जितना यहां से विधायक एवं राज्य के कैबिनेट मंत्री डॉ. बनवारीलाल की राजनीति पर नजर आएगा। डॉ. बनवारीलाल अपने उम्मीदवार शिवनारायण जाट को जीताने में कामयाब हो गए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि उन्होंने जमीनी तौर पर अपनी अलग से ताकत स्थापित कर ली है। अगर शिवनारायण हारकर तीसरे चौथे नंबर पर भी चले गए तो डॉ. बनवारीलाल के लिए सफाई देने लायक भी कुछ नहीं बचेगा।
चंद्रपाल चौकन – वीरेंद्र सिंह एडवोकेट कहीं चौंका ना दे
नपा चेयरमैन के नतीजों से पहले जो रूझान आ रहे हैं उसमें हार-जीत दो निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच बताई जा रही है। इसमें चंद्रपाल चौकन एवं बीरेंद्र सिंह एडवोकेट है। हालांकि यह कयास है जो परिणाम के बाद उलट भी सकते हैं। चौकन की जीत के कई आधार है जो दावे को पुख्ता करती है। आइए इसे समझते हैं। पहला चौकन अपने समाज से अकेला प्रत्याशी है। चेयरमैन रहते हुए भी छवि बेहद साधारण और बिना लाग लपेट वाली रही है। ज्यादा उम्मीदवार होने से वोटों के बिखराव का सीधा फायदा मिलेगा। जीतने पर सरकार के साथ जाना तय है। इस चुनाव में केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की खामोशी का फायदा भी चौकन को मिलेगा। भाजपा में अपने उम्मीदवार को लेकर अंदरखाने जबरदस्त खिलाफ है साथ ही उनकी सहयोगी पार्टी भी उनके खिलाफ मैदान में नजर आ रही है। अलग से पंजाबी व जाट समुदाय के चार उम्मीदवार खड़े होने से वोटों का धुव्रीकरण भी चौकन की जीत को आसान बना रहा है। उधर दूसरी तरफ वीरेंद्र सिंह एडवोकेट भी पूरी तैयारी के साथ टक्कर में हैं। उनकी छवि दमदार तौर तरीके वाले उम्मीदवार के तौर पर देखी जा रही है जो किसी दबाव या प्रभाव में आकर निर्णय नहीं लेते। हार जीत का अंतर बेहद कम वोटों से रहेगा इसलिए बाजी किसके पक्ष में पलट जाए यह भी चौंकाने वाली बात होगी। इतना जरूर है कि भाजपा प्रत्याशी के लिए जीत आसान नहीं है। अगर वे बाजी मार ले जाते हैं तो बहुत बड़ी बात होगी। बाकी उम्मीदवारों को मिलने वाले वोट उन सभी का समीकरण बिगाड़ेंगे जिसके भरोसे पर वे चुनाव मैदान में उतरे थे। देखना है किसका भाग्य कहां करवट लेता है।
वोटों के खरीदने का खेल भी चला है
चुनाव में मुकाबला कांटे का रहा है इसलिए वोट की खरीद फरोख्त का खेल भी अदंरखाने जमकर चला है। चुनाव परिणाम के बाद ही यह खुलासा होगा कि अपनी वोट बेचने वाले ने कितनी वफादारी निभाईं या वह भी खरीदने वाले के साथ राजनीति कर गया।