होई जबै द्वै तनहुँ इक
सांसरणी की मढ़ी ( अध्याय 22)
वह अचानक चुप हो गया। मुझे लगा भाव -विह्वल हो गया है, या फिर बेहोश बावरी का सिर अपनी गोद में होने का दृश्य सामने आते ही यादों में खो गया है। एक वक्फा बीत गया। मैं इंतज़ार करता रहा, वह कहानी आगे शुरू करे। आख़िर उसकी चुप्पी टूटी।
“तुम सोच रहे होगे कि रोज़ाना कीमत दुगनी करने की जो शर्त मैंने रखी थी, वह एक मज़ाक था, जो मैं भूल गया हूँ। नहीं, बिल्कुल नहीं।आज पंद्रह दिन हो गये हैं।”
उसने एक नज़र से मेरी ओर देखा, और अंगुली से ज़मीन पर लिखा ” ८१९२००”।
मैंने उसकी आँखों से आँखें मिलाई। मैं कहने ही वाला था कि तुम क्या समझते हो- पैसे पेड़ों पर लगते हैं?”
इतने में उसने हाथ के इशारे से मुझे रोक कर कहा,” मैं जानता हूँ पैसे पेड़ों पर नहीं उगते हैं। कहानियाँ भी पेड़ पर नहीं लगती हैं। कई ज़िंदगी लगती हैं, एक कहानी में। मैंने कितने खून किए हैं, बताया था ना तुम्हें।”
” चार!” मुझे बिल्कुल याद था।
“बावरी के बाद, दो और कौन होंगे, तुम समझ गये होगे? यह चौथा कौन है, कुछ अंदाज़ा लगा सकते हो?”
” वह सांसर जो झूठ बोल कर तुम्हें गागडिया लेकर गया था?”
वह एक नियंत्रित हँसी के साथ बोला, ” बहुत गौर से कहानी सुन रहे हो। पर नहीं। वह तो लगता है अपनी ही अर्थी का सामान लाने गया था। उसी शाम एक ट्रक के नीचे कुचला गया। मगर एक तीसरा आदमी भी था, बावरी की मौत का ज़िम्मेदार। उसे ख़त्म किए बिना मेरी कहानी पूरी नहीं हो सकती थी। खैर, आख़िर तक ठहरोगे तो सब पता चल जाएगा तुम्हें। मगर हाँ, पैसे तो तुम्हें देने ही होंगें। यह रकम कोई बड़ी रकम नहीं है। पर अब कुछ दिन जो हमारा खेल चलेगा उसमें यह बहुत बड़ी हो जाएगी।”
मैं उसे घूर कर उसके भीतर झाँकने का प्रयास कर रहा था।उसने विषय बदल दिया।
“मैंने तुमसे बाघोत के शिव मंदिर का ज़िक्र किया था। पर तुम हो कि कोई सवाल ही नहीं पूछते हो। लगता है पैसे का हिसाब मन में आ जाता है।”
उसने मुझ पर तरस भरी नज़र डाली।
” पर अब तो ना तुम बच सकते हो और ना मैं। बचपन में गये हो तुम शिवरात्रि के मेले में, नहीं? वहीं शिव मंदिर के पास है सांसरणी की मढी।”
मुझे लगा उसकी गर्दन पकड़ कर कहूँ। कौन हो तुम? तुम मुझे जानते हो तो बताते क्यों नहीं, कौन हो तुम?
पर नहीं, वह आधा मनुष्य मुझे लगा मुझ से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली है।
मैं गया था बाघोत के मेले में लीलू के साथ। और कौन था हमारे साथ, मुझे याद नहीं। मैंने देखी है सांसरणी की मढ़ी। कोई कुछ नहीं जानता इस मढ़ी के बारे में। एक तिकोना सा काला पत्थर गड़ा था, पीपल के नीचे। शिवजी पर जल चढ़ाने के बाद सब इस मढ़ी पर एक दीया जलाते थे। पर यह कौन है?
मुझे कई बार ख्याल आया था कि मुझे इससे मिलना बंद कर देना चाहिए। कहानी का क्या है, मैं भी तो अपनी कोई कहानी लिख सकता हूँ। पर जाने कुछ था जो मुझे खींच कर रोज़ उसके पास ले जा रहा था। मैं सोच ही रहा था कि मुझे इसके जाल में नहीं फँसना चाहिए था। और कल से नहीं आऊँ तो?
इतने में वह बोल पड़ा, ” अगर यह सोच रहे हो कि कल से या बावरी की मौत तक की कहानी सुनकर आना बंद कर दूँगा, तो बहुत बड़ी भूल कर रहे हो। अब कहानी तो तुम्हें अंत तक सुननी होगी। इसलिए ज़रूरी है, मैं तुम्हें आगाह कर दूं।”
मैंने उसकी तरफ देखा तो मुझे लगा, वह अपने तीर से मुझ पर निशाना साध चुका है, और मेरे हिलने से पहले वह मुझे बीन्ध देगा।
” बहुत मुश्किल से मैं तुम तक पहुँचा हूँ। बहुत साल लगे हैं। बहुत सी बाधाएँ पार की हैं मैंने। तुम भी एक किरदार हो मेरी इस हृदय- विदारक कहानी के। धीरे धीरे सब याद आ जाएगा तुम्हें। पर घबराओ मत, कहानी कितनी भी मार्मिक हो, अंतत: खूबसूरत होती है….वैसे जिस जगह तुम रह रहे हो, यहाँ एक फ्लॅट की कीमत दो तीन करोड़ तो होगी।”
मैं कुछ बोलूँ, इस पहले ही उसने कहा, ” नहीं, बिगड़ो मत, मैं तो तुम्हें याद दिला रहा हूँ। बचपन में कहा करते कि मैं जितना भी कमाऊँगा, जोड़ूँगा, एक दिन सब बेचकर अपने गाँव लौट आऊँगा। अपने दोस्तों के साथ बैठ कर बचपन की यादें ताज़ा करूँगा। लगता है वक़्त आ गया है।”
वह थमा। फिर बड़े ही संयत स्वर में बोला, ” मेरा पूरा पैसा चुका कर भी काफ़ी कुछ बचेगा। और याद करो, तुमने सांसरणी की मढ़ी पर दीया नहीं जलाया था। कहा था- मैं नहीं मानता यह सब!….वैसे मानता मैं भी नहीं हूँ। ”
आज जब मैं वहाँ से उठा तो थोड़ी देर तक लगा मेरे शरीर पर सिर है ही नहीं। मेरे सोचने की शक्ति ख़त्म हो गयी है।
मैं रात भर करवट बदलता रहा।
कौन है यह जो इतना सब जानता है मेरे बारे में। यह लीलू का चचेरा भाई तो नहीं, जो शायद उस दिन हमारे साथ मेले में गया होगा। उसकी शर्त लगाने की आदत मुझे फिर याद आयी। मगर ऐसा नहीं हो सकता। वह तो बहुत पहले मर चुका है, किसी ने मुझे बताया था।
और वह सांसरणी की मढ़ी! वह तो इसके और बावरी के जन्म से भी पहले की है।
क्रमश: जारी..
