बिखरे बाल, फटे वस्त्र, और विक्षत देह; परंतु बावरी मुझे प्रदूषित नहीं, बल्कि अलन्घ्य पवित्रता की मूर्त लग रही थी

होई जबै द्वै तनहुँ इक


 संताप यात्रा  (अध्याय 23)


Babuरणघोष खास. बाबू गौतम 

हिसाब की बात जहाँ थी, वहीं छोड़ कर आज मेरे पहुँचते ही वह कहानी पर आ गया। उसकी नज़र कहीं और थी।

जब मैं बावरी का सिर अपनी गोद में लेकर बैठा था, तो मुझे लगा मेरे पैर नहीं हैं, अब मैं कभी भी खड़ा नहीं हो पाऊँगा। उसी समय मेरे धड़ में एक प्रबल शक्ति का संचार हुआ। मुझे लगा दुनिया की कोई भी ताक़त ना मुझे हरा सकती है, ना मार सकती है। शक्ति क्या होती है, पहली बार मुझे एहसास हुआ। शक्ति ना पर्वत है, ना मनुष्य। शक्ति है, पर्वत पर चढ़ने का निर्णय। ऐसा निर्णय कोई अकारण नहीं लेता है। मुझे मेरा कारण मिल गया था।

बिखरे बाल, फटे वस्त्र, और विक्षत देह; परंतु बावरी मुझे प्रदूषित नहीं, बल्कि अलन्घ्य पवित्रता की मूर्त लग रही थी। मेरे चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी। उस मुस्कान के साथ मैं उसे निहारता रहा। मैं नहीं चाहता था, वह झटके से होश में आए। मैं धीरे धीरे उसके बाल सहलाता रहा। ऐसा लग रहा था, मेरी हथेली के स्पर्श से उसकी पीड़ा मुझ में उतर रही है।

उसने आँख खोली। मेरी ओर देखा, जैसे मुझे पहचान नहीं रही है। धीरे धीरे घृणा और आक्रोश से उसकी आँखें रक्तिम हो गयी थी।

मुझे धकेल कर वह अचानक खड़ी हो गयी। ज़ोर से चीखी, ” दरांती कठे सै म्हारी। चीर कै धर दयूँगी। सीतडी सांसर सूँ। अपनी मां री कोख से निकल्या सो, तो हात लगा के दिखावो।” वह मुझे ऐसे घूर रही थी, जैसे उसका पति नहीं, बल्कि मैं भी उसका दुश्मन हूँ। जैसे भाग्य ने मुझे भी उसे हराने के लिए ही भेजा है। अत्यधिक क्रोध से उसे फिर एक गश आया और निढाल होकर गिर गयी।

अब वह नीम बेहोश थी। छूते ही मेरा हाथ झटक दे रही थी। रात गहरा रही थी। मैंने दीया भी नहीं जलाया था। कुछ ज़रूरत नहीं महसूस हुई। रोशनदान से आ रही चाँदनी काफ़ी थी, इस अंधेरे को पाटने के लिए। रोशनी चुभेगी, मुझे लगा।

बावरी के पास बैठ, मैने एक घातक मृदुता से बोलना शुरू किया,” अब तुम नहीं, मैं अलग करूँगा उनके सिर से धड़। मैं दूँगा उन तीनों को मौत, जिन्होंने तुम्हें आहत किया है। मगर मृत्यु से पहले इन दो के शरीर पर तुम्हारी दरांती से खोद खोद कर सहस्र रक्त-रंजित योनियों का आघात दूँगा। अपनी आँखों से देखूँगा उन हज़ार घावों से बहता हुआ खून।”

बावरी की पलकें हिलने लगी थी। मैंने फिर उसे अपनी गोद में ले लिया।

” तुम पवित्र हो बावरी। तुम अपने संकल्प में विजयी हुई हो। देह पर आघात से मनुष्य दूषित नहीं होता है, केवल आहत होता है।”

उसने अचानक मुझे अपनी बाहों में कस लिया। और फूट फूट कर रोने लगी।

” ना ना भंवर जी ना,  बेहू की हो गयी थारी बावरी।”

जब रो रो कर थक गयी, तो बैठ गयी। मेरी आँखों में आँखें मिलाकर रुआंसे स्वर में बोली।

” थे बी धोका दिया म्हानै। बता तो देता, कून था ये? थम ने सब बेरा था।”

मैं नीची नज़र करके सुनता रहा।

वह मेरे पास बैठी थी। मुझ में हिम्मत नहीं हुई उसे छूने की। लगा, युगों युगों की भीषण पीड़ा से गुजरना होगा, मुझे उस तक पहुँचने के लिए।

मुझे लगा, प्यार का  वह मोती जो मुझे संयोग से मिला था, सागर में गिर गया है  या सहरा में, मुझे नहीं पता है। मुझे उसे खोजना है।

मेरी संताप यात्रा अभी चल रही है।

उसने मेरी ओर देखा।

 

क्रमश: जारी……