होई जबै द्वै तनहुँ इक
देह के उस पार ( अध्याय 24)
बावरी की चेतना लौटी, मगर उसने ज़िंदगी में कदम रखने से मना कर दिया। वह पूरी वापस नहीं आई थी। उसका वजूद केवल दो आँखें थी जिनसे वह दिन और रात बस मुझे देखते रहना चाहती थी। अपनी देह से उसे नफ़रत हो गयी थी। उसे वह त्याग देना चाहती थी। मुझे एक पल के लिए भी नज़रों से दूर नहीं जाने देती।
मैंने जब भी कहा- “मैं उन दोनों को ऐसी मौत दूँगा कि कोई पुरुष कभी भी किसी स्त्री का बलात शील हरण करने की सोचेगा भी नहीं।”
तो बस एक बात कहती,” ना ना, थानै म्हारी सूँ। थे म्हानै छोड़ कै एक पल भी जाओ तो।”
गाएँ रंभाती तो मैं जाकर चारा डाल देता। हमारे खेत खड़े सूख गये। सूरज कब निकलता था, कब छिपता था, हमें कोई एहसास नहीं था।मौसम आए, गये, हमें कुछ खबर नहीं थी।
मैं ज़बरन उसे थोडा बहुत खिला देता तो खा लेती। उसे पता था अगर वह नहीं खाएगी तो मैं भी भूखा बैठा रहूँगा। मेरा पूरा दिन उसे बच्चे की तरह संभालने में निकल जाता।
मैंने बहुत कोशिश की उसे समझाने की। बावरी तुम आज भी गौरा सी पवित्र हो।पर वह नहीं मानी। उसकी आँखों से आँसू ढलकते रहते।
” मैं बेहू की हो गयी भंवर जी! म्हारो संकल्प टूट गयो। अब तो बस इस देही से पीछो छूटा द्यो म्हारो।”
सुनकर मैं क्रोध से काँपने लगता था। उस की आँखों की धार देख कर मेरी आँखें भी तर हो जाती। वह बोलती जाती- ‘पर ये आन्ख्या बस यूँ ही रह जायं थाने देखती। बस मैं चली जाऊं।”
फिर अचानक गुस्से में दहकने लगती- “ थे बताया क्यूँ नहीं म्हानै? दोन्या का टुकड़ा टुकड़ा कर देती। किमी सूँघा दियो म्हानै, जाई का यार।”
कुछ दिन में बावरी की देह सूखने लगी। वह टकटकी बाँधे मुझे देखती रहती। मैं आत्म -ग्लानि से दबा, नज़रें चुराता रहता।
मैंने उसे एक दिन बताया, “बावरी तुम हारी नहीं हो। तुम जीत गयी हो, तुम्हारा संकल्प पूरा करने में ब्रह्मा ने भी तुम्हारा साथ दिया है। चाहे इंद्र ने कितना भी घिनौना षडयंत्र रचा है, पर वह तुम्हें हरा नहीं पाया है। पता है तुम्हें क्या हुआ है, गागडिया में ? लो मैं आज तुम्हें बता ही देता हूँ। बावरी तुम्हारा बाप मरा नहीं था। यह सब उन दोनों ने मुझे धोखा देने के लिए चाल चली थी।”
बावरी को अपने बाप के जीवित होने की कोई खुशी नहीं हुई।
“मैं जब वहाँ पहुँचा, तो तुम्हारे बाप ने मायूस होकर बताया था मुझे: ‘हम तो बर्बाद हो गये कंवर जी। सांसरों का तो दुनिया से नाम निशान ही मिट जाएगा, आज आठ सा ल हो गये, गागडिया में बेटी नहीं जन्मी है। बिरमा जी ने म्हारा वंश ही ख़त्म कर ने की ठान ली।’ ज़रा सोच कर देखो।तुम्हारी जीत हुई है बावरी। सांसर ख़तम हो जाएँगे और उनके साथ ही उनका यह कलुषित रिवाज़। इंद्र की हार होगी।”
बावरी कई देर तक मेरी ओर घूरती रही। अंत में उसकी आँखों में एक हल्की सी चमक आई, जो पीड़ा को नहीं बेध पाई। उसे शायद लग रहा था, पूरा कुछ नहीं होता है, बस पार जाना होता है। मुझे पहली बार लगा देह के उस पार भी जीवन है। वहीं एक दिन रहेंगे, मैं और बावरी।
क्रमश: जारी ..
