रणघोष की सीधी सपाट बात

 एक्सईएन अजय सिक्का के इस्तीफे में नप में चल रही कारगुजारियों के राज छिपे हुए हैँ


रणघोष खास. सुभाष चौधरी


भ्रष्टाचार के रंग में रंगदार हो चुकी नगर परिषद रेवाड़ी को सबसे ज्यादा अपनी आंखों में समाने वाले एक्सईएन अजय सिक्का ने अचानक अपनी नौकरी का त्याग पत्र देखकर एक बार फिर नप में चल रही अलग अलग तरह की कारगुजारियों को बेपर्दा कर दिया है। इस्तीफा देना बड़ी बात नहीं है लेकिन जिस परिस्थितियों में दिया जा रहा है वह महत्वपूर्ण हो जाता है।  सोचिए एक अधिकारी अपनी रिटायरमेंट से 11 माह पहले इस तरह का कदम क्या सोचकर उठाएगा। सिक्का ने इसकी वजह निजी बताई है जबकि  इस तरह के कारणों में नौकरी कभी वजह नहीं बनती है वो भी जब सर्विस का समय एक साल से भी कम का बचा है। भला सोचिए कोई अधिकारी जिसे रिटायरमेंट होने से पहले एक इंक्रीमेंट ओर मिलना है और वह आर्थिक तौर पर अपना नुकसान कराकर अपनी निजी वजहों को कैसे ठीक कर सकता है। निजी वजहों का नौकरी से कोई लेना देना नहीं होता है। पारिवारिक पृष्ठभूमि मे सिक्का के पारवारिक सदस्य बेहतर एवं सफल पोजीशन पर है। असल में सिक्का नप में अधिकारियों के बीच चल रही गुटबाजी, तरह तरह के मामलों को लेकर कुछ माह से परेशान चल रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि ऐसा पहली बार हो रहा है। सिक्का शहर के स्थानीय निवासी होने के साथ साथ नप में हर तरीके की चुनौतियों में निपटने में पारंगत है। नप में ऐसा कोई अधिकारी नहीं जो सिक्का के तजुर्बें एवं उनके दिमाग को अपने हिसाब से चला सके। इसमें कोई दो राय नहीं की नप में तकनीकी विभागों में जेई एवं एमई के लगभग सभी पद खाली हैं। जिसका अतिरिक्त कार्यभार भी सिक्का को परेशान कर रहा था। अमूमन यह नई बात नहीं है। वजह बड़ी है जो सीधे तौर पर कहीं ना कहीं भ्रष्टाचार में डूब चुकी नप की असलियत को सामने ला सकती है। या तो अजय सिक्का नप में अपनी हैसियत या उससे कम स्तर के अधिकारियों की तरफ से किए जा रहे खेल को लेकर चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। या फिर ऐसे मामलों को लेकर उनकी सीनियर्स से ठनी हुई थी जिसका खुलासा होने पर भी नप दागदार हो सकती थी। हालांकि सिक्का पर भी समय समय पर तरह तरह के आरोप लगते रहे हैं लेकिन वे कब खत्म हो गए या चल रहे हैं। इसका सच आना भी जरूरी है। कुल मिलाकर सिक्का का इस्तीफा बेशक नियमों के आधार पर स्वीकृत नहीं हुआ लेकिन उसने नप की छिपी असली नब्ज को सामने ला दिया है। जिसका इलाज भी अधिकारियों के पास है और इसे जन्म देने वाले भी वे खुद है।