होई जबै द्वै तनहुँ इक
छोटा कद और लंबे साये ( अध्याय 18 )
भरे शहर में एक नगण्य विकलांग ने मुझे अपने जाल में फँसा लिया है, और मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ। नहीं, यह कहना उचित नहीं है। मैंने स्वयं अपनी गर्दन फंदे में डाली है। क्या यह प्रारब्ध है? क्या मैं सचमुच इस मकड़जाल से बाहर नहीं निकल सकता हूँ? अगर मैं यह पूरी बात आज रात अपनी पत्नी को बता दूँ तो?…. नहीं, वह विश्वास ही नहीं करेगी। कल सुबह होते ही बेटी को फोन करेगी। ” बेटी तुम्हें क्या बताऊं? तुम भी कहोगी, मम्मी कैसी बातें कर रही हो? पर तुम्हारे पापा को कुछ तो हो गया है। मुझे तो पहले ही लग रहा था, इनका ये कहानियाँ लिखने का पागलपन देख कर!” और फिर यह तमाम किस्सा मेरे विक्षिप्त हो जाने से लेकर, प्रेत या पितृ-आत्मा का प्रकोप, और ना जाने किस किस तरह से खोल उधेड़ कर देखा जाएगा।
नहीं, बेहतर होगा मैं इस बावेले को अपनी घरेलू ज़िंदगी से बाहर ही रखूँ। यह भी तो हो सकता है मैं कल से उसके पास जाना ही बंद कर दूँ।
सोचता हुआ मैं बालकनी मे जाकर खड़ा हो गया।
मेरा कलेजा अचानक मुँह में आ गया। घने पेड़ों के बीच से फाइव गार्डेन का एक ही स्पॉट यहाँ से दिखाई देता है, और एक ही बेंच। जहाँ बैठ कर थोडी देर पहले मैं उसकी कहानी सुन रहा था। वह अब तक वहीं बैठा है। मगर यह जगह तो मैंने ही चुनी थी। मैं झट से भीतर आ गया। कहीं वह पलट कर मुझे देख ना ले।
अगर मैं नहीं गया तो कल यह घिसटता हुआ, मेरे दरवाज़े तक आ सकता है। कुछ तो है, वरना यह इतना विश्वस्त कैसे है। पैसे का भी ज़िक्र नहीं कर रहा।
हम कुछ करते हैं, क्षणिक मनबहलाव के लिए; मगर ज़िंदगी की बही में वह लिखा जाता है, ज़िंदगी भर के लिए। शायद वह भी आज ऐसा ही सोच कर कहानी सुनाते हुए रुक गया था- ‘काश इन दोनों के साथ मैं ढाणी गागड़िया नहीं गया होता।’ मगर यह सब पृष्ठमति की समझ है। सही बात तो यह है कि हम जो कुछ भी करते हैं, सही या ग़लत, बस केवल वही एक संभावना बची होती है। शेष सब विकल्प समाप्त हो जाते हैं। ढाणी गागड़िया नहीं गया होता तो, बावरी से कहाँ मिलता? जीवन पल पल की कड़ियों से बनी एक विशाल माला है। एक घटना दूसरी से जन्मती है।
वरना हम जो करते हैं, वह क्यों करते।
मैं रात देर तक करवटें बदलता रहा। मेरी पत्नी सो गयी थी। शायद ऐसे ही लेटी हो, आँखें मूँदे हुए। हम कितना भी पास हों, मगर बहुत कम जानते हैं एक दूसरे को। एक दूसरे का एक बड़ा हिस्सा एक दूसरे से छिपा रहता है। ऐसे ही सोई हुई या जागती हुई लेटी होगी बावरी, जब इसने उसकी साँस बंद कर दी होगी।
मैंने सिर हिला कर, विचार को झटक फेंकने की कोशिश की। मगर विचार सिर के भीतर होता है। मेरी करवट के साथ इधर से उधर मेरे मगज़ में लुढ़कता रहा। जैसे ही कुछ और सोचता, बीच में आकर अड़ जाता। मैंने अपनी पत्नी की ओर देखा। मुझे लगा छटपटा रही है, उसका दम घुट रहा है। लगा, मैं कुछ पागलपन की हरकत कर बैठूँगा, इसलिए धीरे से उठ कर बालकनी में चला गया। घुप अंधेरा था। क्या पता वह अभी भी वहीं बैठा हो?
मैं जब तक पूरी कहानी नहीं सुन लूँगा, मुझे इस बेचैनी से निजात नहीं मिलेगी। मैंने मन बनाया, मैं कल ज़रूर जाऊँगा और आगे की कहानी सुनूँगा। तब कहीं जाकर नींद आयी।
अगले दिन उसे धूप को निहारते बैठा देख, मुझे ख्याल आया। यह आता किधर से है? कहीं आस पास तो नहीं रहता है?
नहीं.. नहीं.. मैं ऐसा कोई सवाल इस से नहीं पूछूँगा। मैं कहानी के सिवाय इसके बारे में कुछ नहीं जानना चाहता। मैं इसे कोई मौका नहीं दूँगा यह मेरे बारे में कुछ भी और जान सके। हो सकता है यह पहले ही मेरे बारे में बहुत कुछ जानता है। या सब कुछ जानता है?
उसे याद था उसने बात कहाँ छोड़ी थी। सूत्र पकड़ कर शुरू हुआ।
“जब भी कोई दरवाज़ा खटखटाता, मैं भाग कर खोलता। नहीं चाहता था, अचानक बावरी का उन दोनों से आमना सामना हो। मेरे इस बर्ताव पर बच्चे और औरतें हैरान थी। मैं जानता था। मुझे थोड़ा अजीब भी लग रहा था कि ये दोनों इतने दिन हो गये मेरे घर पर क्यों नहीं आये। इन्हें खबर तो पक्का लग गयी होगी कि मैं एक सांसरणी से ब्याह रचाए बैठा हूँ। दोनों हरामज़ादे हाथ पर हाथ मार कर हँस रहे होंगे। या पता नहीं कोई साज़िश रच रहें हों।
बस ऐसे ही एक दिन मैं छत पर बैठा मटर छील रहा था। बावरी छम छम करती हुई दौड़ कर आई। उसने आज शिव जी का व्रत रखा हुआ था। बड़ी खुश लग रही थी। “चालो जी नीचै चालो , दो जणा आया कोई गाम सें । भौत ही भले दीखेँ।”
मेरे हाथ थे वहीं रुक गये।
“पर दरवाज़ा तो खटका ही नहीं।”
“अब चालो ना थे।” उसने मनुहार की।
मुझे अपने दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी। धक.. धक.. धक..
जब बावरी ने मेरा हाथ पकड़ कर खड़ा किया तो मैंने देखा, हमारा कद छोटा सा है, और हमारे साये बहुत लंबे।
क्रमश: जारी..
