ग्वालियर में सड़क पर भीख मांगते मिले पुलिस इंस्पेक्टर की कहानी से आप बहुत कुछ सीख सकते है

मध्य प्रदेश के ग्वालियर के स्वर्ग सदन आश्रम में आजकल मनीष मिश्रा नाम के एक शख्स से मिलने पुलिस के अधिकारियों का आना जाना लगा है.
मनीष मिश्रा अपनी ज़िंदगी सड़कों पर बरसों से गुज़ार रहे थे लेकिन कुछ दिनों पहले वो इस आश्रम में आए हैं. मनीष मिश्रा से मिलने वाले पुलिस अधिकारी वो लोग हैं जो किसी समय में उनके बैचमेट हुआ करते थे.
स्वर्ग सदन आश्रम के संचालक पवन सूर्यवंशी ने बताया, “मनीष मिश्रा काफी अच्छे से रह रहे हैं. आश्रम के अंदर उनकी अच्छी देखभाल की जा रही है. और वो काफी अच्छा महसूस कर रहे हैं.”
“मनीष मिश्रा से मिलने लगातार उनके बैचमेट आ रहे हैं और उनसे उनके साथ गुज़ारे पुराने किस्सों को याद कर रहे हैं. अभी कोशिश की जा रही है कि उन्हें कम से कम 4 से 5 महीने यहां रखा जाए ताकि वो पूरी तरह से सही हो जाएं.”
मनीष मिश्रा की कहानी जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. बात 10 नवंबर की है जब ग्वालियर में उपचुनाव की मतगणना हो रही थी. उस दौरान रात के लगभग 1.30 बजे पुलिस विभाग के दो डीएसपी सुरक्षा व्यवस्था में लगे हुए थे. इसी दौरान उन्होंने एक भिखारी को ठंड में ठिठुरते हुए देखा.
उसकी हालत को देखते हुए उन दो अधिकारियों में से एक ने अपने जूते तो दूसरे अधिकारी ने अपना जैकेट उस भिखारी को दे दिया. इसके बाद दोनों अधिकारी वहां से जाने लगे तो उन दोनों को उस भिखारी ने उनके नाम से पुकारा.
यह सुन कर दोनों को थोड़ी हैरानी हुई तो वो पलट कर उसके पास गए. और उन्होंने जब उससे बात की तो उन्हें पता चला कि वह भिखारी उनके बैच का सब इंस्पेक्टर मनीष मिश्रा है. जानकारी के मुताबिक़ मनीष पिछले 10 सालों से इसी तरह से सड़कों पर गुज़र बरस करके अपनी ज़िंदगी ग़ुज़र रहे थे.
ग्वालियर की झांसी रोड इलाके में सालों से सड़कों पर लावारिस घूम रहे मनीष मिश्रा मध्य प्रदेश पुलिस के सन 1999 बैच के अधिकारी थे. उनके बारे में बताया गया कि वह अचूक निशानेबाज भी थे. शहर में मतगणना की रात सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मादारी डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर और विजय भदौरिया को दी गई थी.

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मतगणना ख़त्म होने के बाद दोनों विजयी जुलूस के रूट पर तैनात थे. इस दौरान फुटपाथ पर ठंड से ठिठुर रहे मनीष मिश्रा से उनका सामना हो गया.
उसे संदिग्ध हालत में देखकर अफसरों ने गाड़ी रोकी और उससे बात की. उसकी हालत देख डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर ने उन्हें अपने जूते और विजय भदौरिया ने अपनी जैकेट दी. उसके बाद उनका नाम पुकारने की वजह से उन्हें पता चला कि वो उनका पुराना साथी था.
रत्नेश सिंह तोमर ने बताया, “उनकी स्थिति इस तरह से उनके मानसिक रुप से बीमार होने की वजह से हुई. पहले वह परिवार के साथ रहते थे लेकिन उसके बाद वो परिवार से भी भग जाते थे तो उन्होंने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया.”
रत्नेश सिंह तोमर ने बताया कि जब उनकी मुलाक़ात उनसे हुई तो वो भी अचंभित हो गए कि कैसे उनका एक साथी उनसे सड़कों पर मिला.
मनीष दोनों अफसरों के साथ 1999 में पुलिस सब इंस्पेक्टर में भर्ती हुए थे. दोनों अधिकारी उन्हें अपने साथ ले जाना चाहते थे लेकिन उन्होंने मना कर दिया.
उसके बाद उन्होंने मनीष को समाज सेवी संस्था के ज़रिये आश्रम भिजवा दिया गया जहां उसकी अब उनकी देखरेख की जा रही है.
मनीष मिश्रा के बारे में बताया जा रहा है कि वो इस हालत में मानसिक संतुलन खो देने की वजह से पहुंचे. मनीष मिश्रा शिवपुरी के रहने वाले हैं, वहां पर उनके माता पिता रहते हैं जो अब उम्रदराज़ हो चुके हैं. चचेरी बहन चीन में पदस्थ हैं.
आश्रम संचालक पवन सूर्यवंशी ने बताया कि चीन में मौजूद उनकी बहन ने फोन लगाकर उनका हाल चाल जाना है. उन्होंने बताया, “उनकी बहन ने बोला है कि वो जल्द आएंगी और देखेंगी कि वो क्या मदद कर सकती हैं.”
उनके शिवपुरी में रहने वाले परिवार से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन अभी उनसे संपर्क नही हो पाया है. मनीष मिश्रा ने साल 2005 तक नौकरी की और उस दौरान वह दतिया जिले में पदस्थ रहे. इसके बाद उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया.
शुरुआत में 5 साल तक घर पर रहे. उनके बारे में जानकारी मिली है कि इलाज के लिए जिन सेंटर और आश्रम में भर्ती कराया, वहां से भी भाग गए. परिवार को भी नहीं पता रहता था कि वो कहा रहते हैं. पत्नी से उनका तलाक हो चुका है.
वहीं, मनीष मिश्रा के दूसरे बैचमेट जो उनसे मिलने आ रहे हैं, उन्होंने भी उनके लिए हर संभव मदद करने की बात कही है. पवन सूर्यवंशी ने बताया, “उनके साथी उनकी मदद के लिये तैयार हैं और वो चाहते हैं कि मनीष मिश्रा अब सामान्य जीवन व्यतीत करें. इसलिये वो न सिर्फ उनसे मिलने आ रहे हैं बल्कि उनकी मदद भी करना चाहते हैं.”
ग्वालियर के लोगों ने बताया कि मनीष मिश्रा सड़क पर भीख मांगकर अपना गुज़र बसर कर रहे थे. उन्हें ग्वालियर की सड़कों पर कई लोगों ने घूमते हुए देखा है.

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