भाजपा हाईकमान के लिए यह लेख आक्सीजन है..

भाजपा अभी से अपने उम्मीदवारों का एलान कर दे, फैसला रामबाण का काम करेगा


    जिस तरह केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने नायब सैनी के नाम पर सीएम की तस्वीर साफ की, तमाम तरह की अटकलें स्वत: खत्म हो गईं


रणघोष खास. प्रदीप हरीश नारायण

हरियाणा में भाजपा तीसरी बार वापसी के लिए उन तमाम फैसलों को पलटती जा रही है जिसकी की वजह से लोकसभा चुनाव में उसे खामियाजा भुगतना पड़ा। जिसके चलते मुख्यमंत्री नायब सैनी अपने से पूर्व सीएम रहे अपने मार्गदर्शक केंद्रीय मंत्री मनोहरलाल की कार्यप्रणाली को बदलने में कोई देरी नही कर रहे हैं। सीएम हाउस को आमजन के लिए पूरी तरह खोल देना और नाराज चल रहे सरपंचों को उनकी शर्तों से ज्यादा देना समेत अनेक फैसलों से सीएम सैनी हालातों को पूरी तरह से कंट्रोल करने में लगे हुए हैं।

एक फैसले से आसान हो सकती है चंडीगढ़ की राह

 इन तमाम रद्दोबदल के बीच भाजपा प्रदेश में तीसरी बार सरकार एक मजबूत फैसले से भी चंडीगढ़ का रास्ता तय कर सकती है अगर वह सावन महीने में ही अपने सभी 90 विधानसभा सीटों के उम्मीदवारों की घोषणा कर दे। जिस तरह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हरियाणा में आकर नायब सैनी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का एलान कर तस्वीर साफ कर दी। ऐसा करते ही नायब सैनी की छवि आमजन और विरोधियों में एकाएक बदलती चली गई की वे किसी रहमो करम या बैशाखी पर बने सीएम नही है। वे अपनी काबलियत और अपने पार्टी के प्रति समर्पण भाव से इस पद तक पहुंचे है। ऐसा करते ही सीएम के अन्य मजबूत दावेदार नेताओं ने भी अपने इरादों  को समय रहते बदल लिया है। इसमें राज्य के गृह मंत्री अनिल विज शामिल है जिन्होंने नायब सैनी के सीएम बनते ही अपना मंत्रीपद छोड़ दिया था। केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने भी स्पष्ट कर दिया की चुनाव नायब सैनी की लीडरशिप में ही लड़ा जाएगा।यानि समय पर किसी निर्णय को लेकर विरोधाभास, गुटबाजी, नाराजगी, खींचातानी की वजह से पार्टी के अंदर बाहर का  जो माहौल बिगड़ता है उसे समय रहते काबू में किया जा सकता है।

प्रत्येक सीट पर बढ़ती जा रही दावेदारी

 इसी तरह तीन माह बाद होने जा रहे विधानसभा चुनाव में प्रत्येक सीट पर टिकट को लेकर दावेदारी बढ़ती जा रही है। अंदरखाने एक दूसरे को कमजोर करने या दिखाने की साजिशें रची जा रही हैं। कार्यकर्ता अलग अलग धड़ों में बंटते जा रहे हैं। टिकट के दावेदार निजी तौर पर चुनाव कार्यालय खोलने के नाम पर तमाम तरह के खर्चें कर रहे हैं। जनसंपर्क अभियान से एक ही घर में भाजपा की तरफ से राम राम के बहाने अनेक दावेदार पहुंच रहे हैं। इससे आमजन भी पूरी तरह से उलझन में है की वह सार्वजनिक तौर पर एक ही पार्टी के किस नेता के साथ चाय पानी करे और किसके साथ नही। लिहाजा उसने भी दूरियां बनानी शुरू कर दी है ताकि वह गुटबाजी का शिकार नही हो जाए।

किस सीट पर कौन मजबूत दावेदार, सभी को पता है

 लगभग 10 सालों से सरकार चला रही भाजपा के रणनीतिकारों को अच्छी तरह से पता है की किस सीट पर कौन उम्मीदवार मजबूत है। कहां पर पार्टी कमजोर है। देखा जाए तो  टिकट को लेकर तीन तरह के दावेदार सामने आ रहे हैं। पहला जिसकी संगठन में अच्छी खासी पकड़ है और बड़े पदों पर रहे हैं लेकिन जमीन स्तर पर मजबूत पकड़ नहीं है। हाईकमान उन्हें पार्टी समर्पण के नाम पर मैदान में उतार सकती है। दूसरा जमीनी स्तर पर मजबूत हैसियत रखने वाले नेता जिसमें कुछ अन्य दलों से आए हैं तो अधिकांश लंबे समय से अपनी सामाजिक मजबूत छवि से अपना अलग ही ओहदा रखते हैँ। उन पर हाईकमान माहौल के हिसाब से दांव खेल सकती है। तीसरा पैराशूट दावेदार जो बिना शराबे प्रचार प्रसार से दूर रहते हैं। हाईकमान में  टिकट दिलाने वाले और बांटने वालों से अच्छा खासा संपर्क बनाकर चलते हैं। उनकी लाटरी भी ऐन चुनाव के समय खुल जाती है। तीन तरह की दावेदारी के बीच भाजपा को अगर संतुलन कायम रखना है तो उसे टिकट को लेकर समय पर स्थिति स्पष्ट करनी होगी। नहीं तो इस बार चुनाव में जातिगत माहौल को देखते अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

लोकसभा चुनाव से सबक लेना चाहिए

अगर सबक लेना है तो लोकसभा चुनाव से लेना चाहिए। 100 से ज्यादा सीटें ऐसी रही जिसमें जीत का अंतर महज कुछ हजारों में रहा। हारने वालों में अधिकांश को टिकट मतदान से 15-20 दिन पहले मिली। जिसके चलते उन्हें आमजन से मिलने और चुनाव का मिजाज और पार्टी के अंदर बाहर चल रही गुटबाजी को समझने और जानने का अवसर नही मिल पाया। हारने के बाद इन उम्मीदवारों का कहना था की अगर टिकट समय पर मिल जाती तो यही हार जीत में नजर आती। समय रहते टिकट का एलान होने से बनते बिगड़ते हालातों को कंट्रोल करना भी आसान रहता है। यही वजह ही जीत का आधा सफर तय कर देती है।