भारत की समुद्री सुरक्षा को अभूतपूर्व मजबूती देने वाली एक ऐतिहासिक डील होने वाली है। प्रोजेक्ट 75(I) के तहत भारतीय नौसेना को छह अत्याधुनिक स्टील्थ पारंपरिक पनडुब्बियां मिलने जा रही हैं। इनका निर्माण जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के साथ साझेदारी में मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में किया जाएगा। यह मेगा डील लगभग 8 बिलियन डॉलर (करीब 72,000 करोड़ रुपये) की है, जो भारतीय रक्षा इतिहास की सबसे बड़ी पनडुब्बी परियोजनाओं में से एक है। बता दें कि जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज इस वक्त भारत की यात्रा पर हैं। रक्षा सूत्रों के अनुसार, मर्ज की इस यात्रा के दौरान अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर होने की संभावना नहीं है, लेकिन अगले तीन महीनों में इसे पूरा किया जा सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूरा कॉन्ट्रैक्ट मार्च 2026 तक साइन होने की उम्मीद है।
मझगांव डॉकयार्ड में ही बनेंगी पनडुब्बियां
इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक है, जिसकी बदौलत ये लंबे समय तक बिना सतह पर आए समुद्र की गहराइयों में ऑपरेट कर सकेंगी। यही उन्नत AIP तकनीक इस प्रोजेक्ट के इतने लंबे समय तक अटके रहने का मुख्य कारण रही। दरअसल, भारतीय नौसेना ऐसी पनडुब्बियां चाहती थीं जो ज्यादा स्टील्थ वाली हों, कम शोर पैदा करें और दुश्मन की नजरों से लंबे समय तक छिपी रह सकें। इतना ही नहीं, ये छह पनडुब्बियां पूरी तरह भारत में मझगांव डॉकयार्ड में ही बनेंगी, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को मजबूत बढ़ावा मिलेगा। जर्मनी की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की निर्माण क्षमता का यह संयोजन भारतीय नौसेना को रणनीतिक बढ़त देगा।
वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्टील्थ पनडुब्बियों के शामिल होने से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री निगरानी, प्रतिरोधक क्षमता और रणनीतिक संतुलन और मजबूत होगा। बढ़ती वैश्विक चुनौतियों के बीच यह प्रोजेक्ट भारत के रक्षा तंत्र को पहले से कहीं अधिक मजबूत साबित होगा। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार, P-75(I) के तहत आने वाली ये नई पीढ़ी की पनडुब्बियां प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (ToT) के साथ आएंगी और इनमें लगभग 60% तक उच्च स्वदेशीकरण स्तर होगा। यह परियोजना भविष्य की P-76 के लिए एक पुल का काम करेगी, जहां पारंपरिक पनडुब्बियां पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन पर आधारित होंगी।
AIP तकनीक है क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल है कि AIP तकनीक आखिर है क्या? AIP का पूरा नाम एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन है। यह एक आधुनिक तकनीक है जो गैर-परमाणु पनडुब्बियों को बिना हवा के लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता देती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को बैटरी चार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह पर आना पड़ता है या स्नॉर्कल का इस्तेमाल करना होता है, जिससे दुश्मन की नजर में आने का खतरा बढ़ जाता है। AIP तकनीक इस कमजोरी को काफी हद तक खत्म कर देती है।
AIP सिस्टम वाली पनडुब्बियां हफ्तों तक पानी के नीचे छिपी रह सकती हैं। पानी के अंदर रहकर दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रख सकती हैं और सही मौके पर अचानक हमला कर सकती हैं। इसका मुख्य कारण है कम शोर। ये बहुत कम आवाज पैदा करती हैं, इसलिए दुश्मन के सोनार सिस्टम के लिए इन्हें ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि आधुनिक नौसैनिक युद्ध में ये चुपचाप हमला करने की क्षमता इन्हें बेहद घातक बनाती है।
हथियार बनाते हैं खतरनाक
रिपोर्ट्स के अनुसार, TKMS के साथ साझेदारी में बनने वाली इन P-75(I) पनडुब्बियों को शुरू से ही AIP के साथ-साथ भूमि-हमला क्रूज मिसाइलों और अन्य अगली पीढ़ी की तकनीकों को शामिल करने के लिए डिजाइन किया गया है। AIP वाली पनडुब्बियां सिर्फ लंबे समय तक छिपे रहने के लिए ही नहीं जानी जातीं, बल्कि इनमें लगे हथियार इन्हें और खतरनाक बनाते हैं। मुख्य हथियार टॉरपीडो होते हैं, जो आमतौर पर 533 मिमी कैलिबर के भारी वजन वाले होते हैं। इनका इस्तेमाल दुश्मन की पनडुब्बियों और बड़े सतह युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।