कोसली में इस नेता की तपिश से मुलाकात जरूरी है

जगदीश के संघर्ष में नहाता रहा कोसली, इसलिए दावेदारी मजबूत


रणघोष खास.कोसली की कलम से

कोसली विधानसभा सीट पर पूर्व मंत्री जगदीश यादव अकेले ऐसे नेता है जिसका राजनीतिक संघर्ष से इस जमीन पर तपता निखरता रहा है। सही मायनों में कोसली इस नेता के संघर्ष में नहाती रही है। इसलिए वह अपने दम पर भी हर चुनाव में मजबूती से नजर आया। टिकट नही मिली तब भी उसके नाम की गूंज बनी रही। अब कांग्रेस की टिकट पर मैदान में मजबूत दावेदारी के साथ नजर आ रहे हैं।

68 साल के जगदीश यादव के हिस्से में राजनीति संघर्ष इस बार के चुनाव में किस मुकाम पर आकर ठहरेगा यह 8 अक्टूबर को आने वाले नतीजों से तय होगा। इतना जरूर है की उसके सामने वो चेहरे खड़े हैं जिनकी उम्र जगदीश यादव के राजनीति तजुर्बे से थोड़ी कम ज्यादा है। जाहिर है कोसली ने जिस तौर तरीकों से लोकसभा चुनाव में रोहतक सीट पर दीपेंद्र हुडडा को खुले मन से गले लगाया। वही हालात बने रहे तो जगदीश यादव की राजनीति यात्रा का वनवास खत्म हो सकता है। हालांकि यह आसान नही है लेकिन फासला भी इतना दूर नही है। जगदीश यादव बखूबी जानते हैं कि किस गांव की चौपाल पर उनके नाम की चर्चा है ओर ओर किस धड़े को नाराजगी है। कोसली का हर गांव उसे जानता है ओर जगदीश यादव हर घर में अपनी पहचान रखते हैं। यही ताकत जगदीश यादव की जीत  का मजबूत आधार बनकर सामने आ रही है। 1991 में हरियाणा विकास पार्टी से चुनाव लड़कर मैदान में उतरे इस नेता ने 1996 में यहां के खानदानी ताकतवर नेता राव इंद्रजीत सिंह को हराकर हरियाणा की राजनीति में हलचल पैदा कर दी थी। जिससे प्रभावित होकर बंसीलाल और उसके बाद ओमप्रकाश चौटाला ने इस जमीनी नेता को अपने मंत्रीमंडल में शामिल कर परिवहन और वन विभाग का जिम्मा सौंप दिया। उसके बाद से आज तक जगदीश यादव कोसली की राजनीति जमीन को अपने कदमों से नापते आ रहे हैं। कांग्रेस में  हुडडा खेमें ने बहुत ही सोच समझकर जगदीश को टिकट दी है। यह भरोसा 2019 में भाजपा ने भी दिया था लेकिन राव इंद्रजीत सिंह की जिद के सामने जगदीश को हाईकमान की नाइंसाफी बर्दास्त करनी पड़ी। कांग्रेस में भी इस बार यही हालात बनते जा रहे थे लेकिन जगदीश समय रहते अपने इरादों से अवगत करा चुके थे। वे जनता की आवाज को अपनी ताकत बनाकर सीधे चुनौती दे रहे थे। नतीजा टिकट जगदीश यादव के पास खुद चलकर आ गई। जिसे लेकर यह नेता अब जनता के बीच अपने इस राजनीति वनवास को खत्म करने की इजाजत मांग रहा है। देखना यह है जनता इस चुनाव के सबसे उम्र दराज इस नेता के संघर्ष को सफलता में बदलती है या फिर उसे अगले पांच सालों के लिए उसे अपने हालातों पर छोड़ देती है।