खोला गौत्र, सामाजिक व्यवहार, मजबूत हैसियत अनिल की जीत में छिपे पांच फार्मूले
रणघोष खास. कोसली की कलम से
कोसली विधानसभा की जमीन पर कमल का फूल खिलाने निकल पड़े जिले के सबसे बड़े गांव डहीना के अनिल की जीत में पांच फार्मूले अपना काम करेगे।
पहला यादव बाहुल्य इस सीट पर अनिल खोला गौत्र से संबंध रखते हैं जो यादव समाज में सबसे ज्यादा है। इसका सीधा फायदा भाजपा के इस युवा नेता को मिलने जा रहा है। दूसरा अनिल के परिवार का सामाजिक व्यवहार और भाईचारा लंबे समय से मजबूत रहा है। इनके दादा और पिता पंचायती ओर सामाजिक भागेदारी में अलग पहचान रखते रहे हैं। तीसरा केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के आशीर्वाद से मैदान में उतरे अनिल को पहले से ही मजबूत राजनीति जमीन मिल गई है जिस पर उसे समझदारी से चलते रहना है। चौथाा अनिल का परिवार आर्थिक तौर पर मजबूत हैसियत रखता है जो किसी भी नेता की क्षमता को बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है। इसके साथ साथ टिकट नही मिलने के बाद तेजी से बदले घटनाक्रम से बने पांचवें फार्मूले में अनिल पहले से ज्यादा मजबूत हो गए हैं। भाजपा की टिकट नही मिलने पर बेहद खफा चल रहे पूर्व मंत्री बिक्रम यादव का ऐन वक्त पर निर्दलीय लड़ने के अपने फैसले को वापस लेकर भाजपा में बने रहना अनिल के वोट बैंक को मजबूत कर गया। इतना ही नही कांग्रेस में टिकट नही मिलने से गुस्साए पूर्व विधायक एवं केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के छोटे भाई राव यादुवेंद्र सिंह ने सीधे तौर पर बगावत कर दी है। वे चुनाव तो नही लड़ रहे लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार को हराने में वे भाजपा उम्मीदवार से ज्यादा ताकत लगाएगे। इन तेवरों से भी इंकार नही किया जा सकता। अनिल के लिए राजनीति में सबसे बड़ा च्यवनप्राश निर्दलीय मैदान में उतर चुके मनोज कोसलिया बनते जा रहे हैं। मनोज कोसलिया कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे और उनकी गिनती कांग्रेस के दिग्गज सांसद दीपेंद्र हुडडा के युवा साथी के तौर पर रही है। मनोज कई सालों से अपना सामाजिक दायरा मजबूत करते आ रहे थे जिसकी धमक इस चुनाव में नजर आ रही भीड़ को देखकर महसूस की जा सकती है। मनोज कोसलिया गौत्र से आते हैं जिनकी संख्या भी यादव समाज में अच्छी खासी है। वे सीधे तौर पर कांग्रेस को बहुत बड़ा नुकसान करते जा रहे हैं। विक्रम यादव का चुनाव नही लड़ना और मनोज का मैदान में डटे रहना अनिल की राह को आसान बना रहा हैं। हालांकि अभी चुनाव में 20 दिन का समय बचा हुआ है इसलिए समय के साथ राजनीति का मिजाज भी बदलना तय है। इसलिए मतदाताओं का रूख कब किस तौर तरीकों से बदल जाए कुछ नही कहा जा सकता।