कापड़ीवास के सामने अब राजनीति भी खामोश है.. कहे तो क्या कहे..
रणघोष खास. रेवाड़ी की कलम से
रेवाड़ी विधानसभा सीट पर भाजपा की जीत का सबसे मजबूत प्रमाण कहलाए जाने वाले उम्र में सबसे बड़े ओर आवाज में जवान रणधीर सिंह कापड़ीवास के लिए 2024 का अंतिम चुनाव था। वे भाजपा की टिकट पर लड़ना चाहते थे लेकिन राजनीति चौधराहट की लड़ाई में दिल्ली ने उनके पक्ष में फैसला नही सुनाकर यह साबित कर दिया की इस रणक्षेत्र में भावनाए ओर संवेदनाए नही रणनीति ओर कुटनीति चलती है। 2019 में भी यही हुआ था ओर इस बार भी कापड़ीवास को यह झेलना पड़ा। वे आहत जरूर है लेकिन निर्दलीय चुनाव नही लड़ेगे यह भी तय माना जा रहा है। उम्र अब उन्हें राजनीति से हटाकर सामाजिक ओर धार्मिक दुनिया में समय गुजारने के लिए कह रही है जिसे लगभग उन्होंने आंतरिक मन से स्वीकार कर लिया है। इसलिए वे आने वाले दिनों में समाज में कई तरह की फैल रही बुराईयां जिसमें नशा प्रमुख तोर से शामिल है उसके खिलाफ लड़ाई का शंखनाद करेंगे। दरअसल रणधीर सिंह और रेवाड़ी की राशि एक होने की वजह से दोनों के हालात और दर्द भी एक जैसे हैं। कापड़ीवास की राजनीति यात्रा ने इतना लंबा फासला तय कर लिया है की वह भी इस नेता के अनुभव के सामने खुद को छोटा समझकर चुनाव में टिकट को लेकर होने वाले ड्रामे से परेशान हो चुकी है। कापड़ीवास राजनीति के अपने अंतिम चरण में वे फैसला नही लेना चाहते तो उनकी गरिमा पर उंगली उठाए। इतना जरूर है की वे भाजपा की आंतरिक व्यवस्था से बेहद पीड़ित है। कापड़ीवास का मानना है की संगठन कभी बुरा नही होता उसमें अलग अलग रास्तों से विशेष मकसद से प्रवेश करके अपना हित साधने वाले उसकी गरिमा को खंडित कर देते हैं। जिसके अनगिनत सबूत चुनाव में टिकट वितरण के तौर पर सार्वजनिक तोर पर सामने आते हैं। इसका खामियाजा वे समर्पित् कार्यकर्ता भुगतते हैं जो अपने संगठन को मां की तरह मानते रहे हैं।