सुप्रीम कोर्ट ने जमानत से जुड़े मामलों में ट्रायल कोर्ट (निचली अदालतों) और जांच एजेंसियों के रवैये पर सख्त नाराजगी जाहिर की है। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि देश को पुलिस स्टेट की तरह नहीं चलाया जा सकता, जहां कानून प्रवर्तन एजेंसियां बिना ठोस कारण के आरोपियों को अनावश्यक रूप से हिरासत में लेने का मनमाना अधिकार रखती हों।
SC की टिप्पणी: ट्रायल कोर्ट अनावश्यक बोझ बढ़ा रहे हैं
पीठ ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कहा,
“दो दशक पहले तक छोटे मामलों में जमानत याचिकाएं शायद ही हाई कोर्ट तक पहुंचती थीं, सुप्रीम कोर्ट की बात तो छोड़िए।”
सुनवाई के दौरान जस्टिस ओका ने कहा,
“यह चौंकाने वाला है कि सुप्रीम कोर्ट को उन मामलों में भी जमानत याचिका पर निर्णय लेना पड़ रहा है, जिनका समाधान ट्रायल कोर्ट स्तर पर ही हो जाना चाहिए था। इससे न्यायिक सिस्टम पर अनावश्यक दबाव बढ़ रहा है।”
बिना जरूरत हिरासत में रखना ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ का उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों द्वारा बेवजह हिरासत में लेने की प्रवृत्ति पर भी कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि अगर जांच पूरी हो चुकी है और आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है, तो आरोपी को जेल में रखने का कोई औचित्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट की आलोचना करते हुए एक आरोपी को जमानत दे दी, जो धोखाधड़ी के एक मामले में दो साल से अधिक समय से जेल में बंद था। इस मामले में जांच पूरी हो चुकी थी, फिर भी आरोपी को जमानत नहीं दी गई।
पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी चिंता
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर नाराजगी व्यक्त की है। अदालत पहले भी कई बार निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों से जमानत देने में उदार रुख अपनाने की अपील कर चुकी है।
2022 में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अगर किसी आरोपी ने जांच में सहयोग किया है और गिरफ्तारी की जरूरत नहीं थी, तो सिर्फ आरोप पत्र दाखिल होने के आधार पर उसे गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए।