आरती के पास राजनीति विरासत, अनिता- अतरलाल के हिस्से में संघर्ष
रणघोष खास. अटेली से ग्राउंड रिपोर्ट
कोई कुछ भी कहे हरियाणा में अटेली विधानसभा सीट 8 अक्टूबर 2024 को आने वाले नतीजों के तुरंत बाद एक ऐसी नई राजनीति को जन्म देने जा रही है जिसमें या तो एक परिवार की राजनीति हमेशा के लिए अपने घर के आंगन में ठहर जाएगी या फिर पारिवारवाद के घोड़े पर सवार होकर सत्ता के सिंहासन के इतने करीब पहुंच जाएगी की भाजपा को अपने कायदे कानून में बदलाव करना पड़ेगा।
दक्षिण हरियाणा के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने अपनी बेटी आरती सिंह राव के लिए इस सीट को बेहद सोच समझकर चुना था। पहला वह मौजूदा माहौल में आरती यहा पूरी तरह से सुरक्षित रहे। राव को अहसास था की भाजपा में उनके विरोधियों की फौज रेवाड़ी व गुरुग्राम जिले में ज्यादा है। इसलिए हमला भी हुआ तो बेअसर होगा। अटेली से इस परिवार का उसी तरह का रिश्ता रहा है जिस तरह गांवों में पुरानी हवेली आज भी एक परिवार की कहानी सुनाती रहती है। राव का इस सीट के लिए अपने स्तर पर सोचना एकदम सही था। इस बार भाजपा हाईकमान ने एक दो जगहों को छोड़कर अधिकांश दक्षिण हरियाणा की राजनीति खेती को पांच साल के लिए राव के नाम पर बोली पर छोड़ दिया । जाहिर है खेती को बंजर होने से बचाने के लिए राव को नारनौल, रेवाड़ी, बावल, कोसली, पटौदी में भी बराबर का पसीना बहाना पड़ रहा है। राव का राजनीति अनुभव अटेली को लेकर इसलिए परेशानी में डाल रहा है की यहा मुकाबला पूरी तरह से त्रिकोणीय बन चुका है जबकि वे लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहा से मिली शानदार बढ़त से एक तरफा मानकर चल रहे थे। कांग्रेस से अनिता यादव ओर इनेलो- बसपा गठबंधन से ठाकुर अतरलाल ने इस चुनाव में अटेली की जमीन को एक एक वोट के लिए नापकर रख दिया है। आरती का चेहरा एक विरासत के तौर पर नजर आता है जिसमें पिता राव इंद्रजीत ओर दादा पूर्व सीएम राव बीरेंद्र सिंह के अलावा कोई संघर्ष नजर नही दिख रहा है। उधर कांग्रेस से अनिता यादव की राजनीति जमीन संघर्ष में नहाकर इस मुकाम तक पहुची है। वह पहले भी इस सीट पर विधायक रह चुकी है। इसलिए उसे पता है एक एक वोट किस अहमियत के साथ उसका इंतजार कर रहा है। उधर सामाजिक शख्सियत ठाकुर अतरलाल की राजनीति यात्रा भी इतनी लंबी हो चुकी है की यहा की जमीन को भी अब खुद से सवाल करना पड़ रहा है की चूक कहां हो रही है। कुल मिलाकर इस सीट पर जो जीतेगा वह दक्षिण हरियाणा का सिकंदर कहलाएगा। वजह यहा लड़ाई एक आम ओर खास राजनीति वजूद को बचाए रखने की बन चुकी है।