जम्मू-कश्मीर में बना दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ब्रिज

रणघोष अपडेट. नई दिल्ली

दुनिया का सबसे ऊंचा सिंगल आर्क ब्रिज जम्मू-कश्मीर में बनकर तैयार हो चुका है. इसके ज़रिए कश्मीर को देश के दूसरे हिस्सों से रेल कनेक्टिविटी के माध्यम से जोड़ा जाएगा.ब्रिज को बनाने में भारतीय रेलवे को 20 साल से ज़्यादा का समय लगा. यह ब्रिज जम्मू के रियासी ज़िले में चिनाब नदी के ऊपर बनाया गया है.ब्रिज की ऊंचाई एफ़िल टॉवर की ऊंचाई से 35 मीटर ज़्यादा है. जल्द ही इस ब्रिज के ऊपर से पहली ट्रेन गुज़रेगी, जो कि बक्कल और कौरी के बीच चलेगी.यह ब्रिज हर मौसम में चलने वाली 272 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का हिस्सा है, जो कि जम्मू को कश्मीर घाटी से जोड़ेगी.

हालांकि अभी इस रेलवे लाइन के लिए कोई टाइमलाइन जारी नहीं की गई है.वर्तमान समय में सर्दी के महीनों में भारी बर्फ़बारी के चलते जम्मू से कश्मीर की ओर जाने वाला सड़क मार्ग बंद हो जाता है.

विशेषज्ञों के अनुसार, नई रेलवे लाइन से भारत को सीमा क्षेत्र में रणनीतिक लाभ होगा.

रणनीतिक तौर पर अहम है ये पुल

चिनाब नदी के ऊपर इस रेलवे ब्रिज को बनाने वाली कंपनी एफ़कॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर के उप-प्रबंध निदेशक गिरिधर राजगोपालन कहते हैं, “इस ब्रिज की मदद से सैन्य बल और ज़रूरी सामान सीमाई क्षेत्र में सालभर पहुंचाया जा सकता है.”रणनीतिक मामलों की विशेषज्ञ श्रुति पांडलाई कहती हैं, “इससे भारत को पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर तनावपूर्ण संबंध वाले पाकिस्तान और चीन के किसी भी दुस्साहस से निपटने के रणनीतिक लक्ष्य का फ़ायदा उठाने में मदद मिलेगी.”लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस पुल को लेकर लोगों की राय मिली-जुली है.नाम न बताने की शर्त पर कुछ स्थानीय लोगों ने कहा कि इस कनेक्टिविटी से निश्चित तौर पर परिवहन को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी, जिससे उन्हें फ़ायदा होगा.लेकिन उन्हें यह भी चिंता है कि इससे सरकार घाटी पर अपना नियंत्रण और ज़्यादा बढ़ा सकती है.यह रेलवे लाइन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा 50 से अधिक राजमार्ग, रेलवे और बिजली परियोजनाओं के साथ-साथ एक बड़े बुनियादी ढांचे के विस्तार का हिस्सा है.

नरेंद्र मोदी सरकार ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में विशेष दर्जा ख़त्म कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था.इस फै़सले के बाद राज्य में महीनों तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू रही.

तब से सरकार ने कई प्रशासनिक बदलाव किए हैं, जिन्हें वो कश्मीर को भारत के अन्य क्षेत्रों के साथ अधिक निकटता से एकीकृत करने के प्रयासों के रूप में देखती है.रणनीतिक मामलों की विशेषज्ञ श्रुति पांडलाई कहती हैं, “इस क्षेत्र के लिए भारत की योजनाएं स्वाभाविक रूप से इसके रणनीतिक लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए बनाई जाती हैं, लेकिन स्थानीय ज़रूरतों और संदर्भ को भी ध्यान में रखना होगा.”