लता मंगेशकर हजारों लाखों गायकों- गायिकाओं की आदर्श रही है। हर कोई उनके गाने उन्हीं की शैली में गाने का प्रयास करता है। लेकिन क्या लता की नकल करके लता बना जा सकता है? लता नकल के सख्त खिलाफ थी। शुरू- शुरू में उन्होंने एक दो गानें नूरजहां की शैली में अवश्य गाए थे, पर बाद में उन्होंने अपनी गायकी को विकसित किया। वे कुंदनलाल सहगल को अपना गुरु मानती थी लेकिन उन्होंने कभी भी सहगल की नकल नहीं की। केवल उनकी गायकी की विशेषताओं को अपनाया। सहगल की सबसे बड़ी विशेषता थी आवाज पर जोर दिए बिना सहजता से गाना। लता ने शास्त्रीय गाने भी गाए तो सहजता से। मनमोहना बड़े झूठे (सीमा) इसका उदाहरण है। ऊंचे सुर में गाए या नीचे सुर में उनकी आवाज एक सी बन रहती थी। आवाज की उठान देखनी हो तो कहीं दीप जले कहीं दिल (बीस साल बाद) सुनकर देखिए। आवाज की गहराई देखनी हो तो दिल का दीया जलाके गया (आकाशदीप) सुनिए। स्वर की पवित्रता देखनी हो तो ज्योति कलश छलके (भाभी की चूड़ियां) और रोमांटिक अंदाज देखना हो तो आप की नजरों ने समझा (अनपढ़) सुनिए। अल्हड़पन देखना हो तो पंख होते तो उड़ आती (सेहरा) और गंभीरता देखनी हो तो मोहे भूल गए सांवरिया (बैजू बावरा) सुनकर देखिए। कोई भी दूसरा कलाकार लता मंगेशकर नहीं बन सकता। हालं उनकी खूबियों को आत्मसात करके उन जैसा अवश्य बना जा सकता हैं।
